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बुधवार, 18 जून 2008

हाय ! हाइब्रिड कार...वेलकम टू इंडिया

होंडा की हाइब्रिड कार

लगातार महंगी होती जा रही पेट्रोल और डीजल पर से निर्भरता कम करने और ग्रीन हाउस गैस को कम करने के लिए कार कंपनियां हाइब्रिड कार बनाने पर जोर दे रही हैं। भारत में आज पहली हाइब्रिड कार लांच हो गई। जिसे लांच किया किया है जापान की कंपनी होंडा ने। इसकी कीमत है साढ़े इक्कीस लाख रुपए।

कार बनाने वाली दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी टोयोटा सहित दुनियभर की ज्यादातर कंपनियों में हाइब्रिड कार बनाने की होड़ में लगी हुई है। और कुछ कंपनियों की हाइब्रिड कारें तो दुनियाभर में काफी पॉपुलर हो चुकी हैं। टोयोटा प्रियस के नाम से हाइब्रिड कार बनाती है। जिसकी कीमत है करीब नौ लाख रुपए हैं। ये कीमत विदेशों में है भारत आने पर इसकी कीमत करीब 100 फीसदी बढ़ जाएगी। प्रियस एक सेडान हाइब्रिड कार है। जिसकी माइलेज है 46 मील प्रति गैलन। यानी करीब 20 किलोमीटर प्रति लीटर। इसका स्पीडोमीटर जीरो से 60 किलोमीटर की स्पीड केवल 10 सेकेंड में पकड़ती है।

होंडा सिविक हाइब्रिड कार की भारत से बाहर कीमत है करीब साढ़े नौ लाख। माइलेज है 18 किमी प्रति घंटा। इंजन की ताकत है 110 हॉर्स पॉवर। निसान अल्टीमा के नाम से हाइब्रिड कार बनाती है। ये भी एक सेडान कार है। जिसकी दूसरी देशों में कीमत है करीब सवा दस लाख रुपए। जानकार इसे टोयोटा हाइब्रिड कार की निसान की पैकेजिंग मानते हैं। इसकी माइलेज है 15किमी प्रति लीटर।

फोर्ड स्केप के नाम से हाइब्रिड कार बनाती है। ये एक स्पोर्ट यूटिलिटी व्हेकिल है। जिसकी माइलेज है 14 किलोमीटर प्रति लीटर।
लैक्सस आरएक्स 400 एच के नाम से हाइब्रिड कार बनाती है। जिसकी कीमत है करीब 17 लाख रुपए। भारत में ये कीमत करीब दोगुनी हो जाएगी टैक्स की वजह से। माइलेज है करीब 9 किलोमीटर प्रति लीटर। ये एक एसयूवी है।

कार कंपनियों का मानना है कि आने वाला जमाना हाइब्रिड कारों का है। इसलिए कोई किसी से पीछे नहीं रहना चाहता। कार कंपनियों की इस होड़ से पेट्रोल और डीजल पर निर्भरता कुछ कम होगी। साथ सड़कों पर धूम मचाते हुए लोग शुद्ध हवा में सांस ले पाएंगे।

अब जानते हैं हाइब्रीड की परिभाषा। आखिर हाइब्रिड है क्या।..दो या दो से अधिक एनर्जी से चलने वाले मोटर्स को हाइब्रीड कहते हैं। हमलोगों ने कहीं न कहीं हाइब्रीड गाड़ी जरूर देखा होगा। याद कीजिए मोपेड को। ये भी एक हाइब्रीड गाड़ी है। मोपेड यानी मोटोराइज्ड पैडल बाइक। जिसमें पेट्रोल और पैडल की एनर्जी का यूज होता है। इसी तरह विदेशों में बड़ी बड़ी कमर्शियल गाड़ियां और बसें हाइब्रीड सिस्टम पर चलती हैं। यानी उसमें डीजल और इलेक्ट्रिक पॉवर साथ साथ रहता है। जहां तक बिजली की तार मिलती है वहां तक बसें बिजली से चलती हैं और जहां बिजली खत्म होती है वहां से डीजल से चलने लगती है। ठीक ऐसे ही अगर कोलकाता के ट्रॉम की इंजन हाइब्रिड कर दी जाए तो उसका दायरा और बढ़ जाएगा। समुद्र में चलने वाली ज्यादातर सबमरीन भी हाइब्रीड इंजन से चलती हैं। क्योंकि उसमें न्यूक्लियर पॉवर और इलेक्ट्रिक पॉवर का यूज होता है।

आखिर क्यों जरूरत हुई हाइब्रिड कार की। प्रति लीटर पेट्रोल भराने के लिए कभी आपको 30 रुपए खर्च करने होते थे। जो अब 35 रुपए 40 रुपए से आगे निकल 50 रुपए पर जा पहुंचा है। साथ ही इससे निकले बाले धूएं से पर्यावण को नुकसान होता है सो अलग। ऐसे में कार बनाने वाली दुनियाभर की कंपनियों ने हाइब्रिड कार की ओर रुख कर लिया है। कुछ कंपनियां केवल इलेक्ट्रिक कार भी बना रही हैं। लेकिन इलेक्ट्रिक कारों को ज्यादा सफलता नहीं मिल पाईं हैं। क्योंकि 80 से 161 किलोमीटर चलने के बाद इलेक्ट्रिक कार को चार्ज करना पड़ता है। और इसकी चार्ज करने की प्रक्रिया बहुत धीमी होती है। स्पीड कम होने की वजह से ट्रैफिक में तालमेल बिठाने की समस्या होती है। हालांकि इससे प्रदूषण नहीं फैलता है।

जबकि एक ट्रेडिशनल कार की टैंक एक बार फुल कराने पर करीब 500 किलोमीटर के लिए आप निश्चिंत हो जाते हैं। साथ ही इसकी री फ्युलिंग काफी आसान है। और ट्रैफिक में तालमेल भी अच्छा है। हालांकि ये ज्यादा तेल पीती हैं और धुआं भी उगलती हैं। ऐसे में ऑटो कंपनियों को हाइब्रिड कार में फ्यूचर दिख रहा है। क्योंकि हाइब्रिड इंजन फ्यूल के साथ ही इलेक्ट्रिक से भी चलता है। और एक बार टैंक फुल करने पर 700 किलोमीटर के बाद ही री फ्यूलिंग की जरूरत होती है । साथ ही इससे पेट्रोल-डीजल पर निर्भरता कम होगी और पर्यावरण भी कम दूषित होगा। यानी कम पैसे में कम धुआं लेकिन ज्यादा दूर तक सवारी भला किसे पसंद नहीं आएगा।