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गुरुवार, 3 मई 2012

चीनी एक्सपोर्ट से शरद पवार को फायदा

आखिरकार शरद पवार ने राष्ट्रपति चुनाव से ठीक पहले चीनी निर्यात पर केंद्र सरकार से अपनी बात मनबा ही लिया। गठबंधन की राजनीति में इस तरह की मांग आम है। अगर सरकार को अपना कार्यकाल पूरा करना है तो सहयोगी दलों की बेतुकी मांगों को मानना उनकी मजबूरी बन जाती है। और इसका खामियाजा पूरे देश को भुगतना पड़ता है।


किसानों के हितों की बात करते हुए शरद पवार केंद्र सरकार से अपना काम करबाने में कामयाब हो गए। इसका खामियाजा आने वाले दिनों में आम लोगों को भुगतना पड़ सकता है। केंद्र सरकार ने चीनी का निर्यात ओपन जरनल लाइसेंस यानी ओजीएल के तहत करने का फैसला किया है। साथ ही प्याज निर्यात बढ़ाने के लिए इसका न्यूनतम निर्यात मूल्य यानी एमईपी खत्म कर दिया गया है।


इसके अलावा दूसरे खाद्य पदार्थों के निर्यात और आवंटन के लिए प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार समिति के अध्यक्ष सी. रंगराजन की अध्यक्षता में समिति बनाने का फैसला किया गया है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में हुई बैठक में ये फैसले किए गए। चीनी निर्यात पर मात्रात्मक प्रतिबंध को भी खत्म कर दिया गया है। अब निर्यातकों को चीनी निर्यात के लिए रिलीज ऑर्डर लेने की आवश्यकता नहीं होगी। चालू पेराई सीजन में पहले ही सरकार 30 लाख टन चीनी निर्यात की अनुमति दे चुकी है।

जानकारों का कहना है कि चीनी निर्यात पर मात्रात्मक प्रतिबंध और रिलीज ऑर्डर की वैधता हटने से उत्तर भारत की चीनी मिलों को नुकसान होगा जबकि महाराष्ट्र और दक्षिण भारत की मिलें फायदे में रहेंगी। यानी इसका फायदा अप्रत्यक्ष रुप से शरद पवार को होगा। क्योंकि चीनी बाजार के एक बहुत बड़े हिस्से पर उनका कब्जा है। सूत्रों का मानना है कि कृषि मंत्री और महाराष्ट्र के कद्दावर नेता शरद पवार के दबाव में सरकार को यह फैसला करना पड़ा है। विदेशों में चीनी भेजे जाने के से देश में चीनी की किल्लत पैदा होगी जिससे महंगाई के इस दौर में कीमतें और बढ़ेंगी। जिसका खामियाजा आम लोगों को उठाना पड़ेगा।

शनिवार, 8 अगस्त 2009

महंगाई की मार सरकार लाचार

दाल की कीमतें पिछले साल के मुकाबले दोगुना हो चुकी हैं। वहीं चावल की कीमतों में तेजी की शुरूआत हो चुकी है। तेल की कीमतें भी पिछले साल के मुकाबले ऊपर ही चढ़ती जा रही हैं। पिछले साल अरहर दाल प्रति किलो मिल रही थी 48 रुपए में जो इस साल बढ़कर 86 रुपए पर पहुंच चुकी है। मूंग दाल 48 रुपए प्रति किलो से बढ़कर 74 रुपए प्रति किलो पर जा पहुंची है। मूंग साबूत पिछले साल 50 रुपए प्रति किलो मिल रही थी। जो इस इस 70 रुपए प्रति किलो पर पहुंच चुकी है। काला मसूर भी एक साल में 48 रुपए से 70 रुपए पर पहुंच चुकी है। वहीं उड़द साबूत पिछले साल 48 रुपए प्रति किलो मिल रही थी। जो इस साल 68 रुपए प्रति किलो पर पहुंच चुकी है। परमल राइस की कीमत पिछले साल 17 रुपए प्रति किलो थी। जो इस साल बढ़कर 20 रुपए पर पहुंच चुकी है। चीनी 22 रुपए प्रति किलो से बढ़कर 29 रुपए प्रति किलो पर जा पहुंची है। महंगाई से फिलहाल लोगों को निजात नहीं मिलने वाली है। ऐसा मानना है प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का। क्योंकि इसबार कम मॉनसून की वजह से खरीफ फसलों की बुआई कम हो पायी है। जिसका असर आने वाले दिनों में खाने पीने के सामानों की कीमतों पर देखी जा सकती है। मनमोहन सिंह महंगाई के मुद्दे पर राज्य के मुख्य सचिवों के साथ मीटिंग के बाद ये बात कही। प्रधानमंत्री ने कहा कि राज्यों को अपनी ओर से भी इस मुद्दे से निपटना चाहिए। कालाबाजारी और जमाखोरी को रोका जाना चाहिए। साथ ही प्रधानमंत्री ने मॉनसून की कमी को कुछ हद तक पूरा करने के लिए सूखा प्रभावित जिलों के किसानों  को केंद्र की ओर से डीजल पर 50 फीसदी सब्सिडी देने का ऐलान किया है। इसके साथ ही मनमोहन सिंह ने कही कि सूखे से प्रभावित राज्यों को सेंट्रल पूल से बिजली दी जाएगी। इस तरह की सहायता के ऐलान के बावजूद प्रधानमंत्री के संकेतों से साफ है कि महंगाई की समस्या आने वाले दिनों में और विकराल रुप ले सकती है। अभी तो दाल, चीनी, सब्जियों की कीमतें ही रुला रही हैं। लेकिन आने वाले दिनों में इस लिस्ट में चावल-मक्का जैसे कई और खाने पीने के सामान जुड़ जाएंगे। क्योंकि इस बार खराब मॉनसून की वजह से खरीफ फसलों की जब बुआई ही कम हो पायी है तो फसल कैसे अच्छी हो सकती है। हालांकि प्रधानमंत्री ने कहा कि सरकार के पास अन्न के पर्याप्त भंडार हैं और देश में किसी को भूख से मरने नहीं दिया जाएगा। लेकिन किसानों में सुसाइड करने की शुरूआत कर दी है!