खाने-पीने के सामान महंगे होते जा रहे हैं। जिसकी वजह से खाद्य महंगाई दर 10 फीसदी के पार पहुंच गई है। महंगाई को रोकने के लिए उठाई गई सरकार की तमाम कोशिशें नाकाम साबित हो रही हैं। खाने-पीने के सामानों की बेकाबू होती कीमतों ने आम लोगों के साथ ही सरकार की परेशानी बढ़ा दी है। साथ ही विपक्ष को एक बड़ा मुद्दा मिल गया है।
खाने-पीने के सामानों की बेकाबू होती कीमतों ने आम लोगों के साथ ही सरकार की परेशानी बढ़ा दी है। महंगाई रुकने का नाम नहीं ले रही है। 8 अक्टूबर को खत्म हुए हफ्ते में महंगाई दर बढ़कर 10.60 फीसदी पर पहुंच चुकी है। जो इससे पहले हफ्ते में 9.32 फीसदी थी। महंगाई पर लगाम नहीं लागाई जा सकी है। ऐसे में कर्ज और महंगे होने की आशंका बढ़ गई है। खाद्य महंगाई दर बढ़ने के पीछे सब्जियों और ईंधन का महंगा होना एक बड़ी वजह मानी जा रही है।
सब्जियों की कीमतों में पिछले साल के मुकाबले 17.59 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। वहीं फल 12.39 फीसदी मंहगे हुए हैं। जबकि दूध की कीमत 10.80 फीसदी बढ़े हैं। मांस व मछली की कीमतों में पिछले साल के मुकाबले 14.10 फीसदी तेजी आई है। दालें 7.42 फीसदी मंहगी हुईं हैं। साथ ही अनाज की कीमतें 4.73 फीसदी बढ़ी हैं।
सरकार ने बढ़ती खाद्य महंगाई दर पर चिंता जताई है। लेकिन सरकार की लगातार कोशिशों के बावजूद महंगाई पर लगाम नहीं लागाई जा सकी है। ऐसे में कर्ज और महंगे होने की आशंका बढ़ गई है। ऐसा माना जा रहा है कि महंगाई को बस में करने के लिए रिजर्व बैंक अपने अगले क्रेडिट पॉलिसी की समीक्षा में एक बार फिर से अहम दरों में करीब 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी कर सकता है। पिछले डेढ़ साल में आरबीआई ने एक दर्जन बार कर्ज दरों में बढ़ोतरी है। लगातार बढ़ रही रेपो रेट का असर तो ग्रोथ पर दिखा रहा है। यानी औद्योगिक विकास दर में लगातार कमी आ रही है। जीडीपी विकास दर का अनुमान लगातार नीचे फिसल रहा है। लेकिन महंगाई इससे बेअसर होकर बदस्तूर बढ़ती जा रही है।
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गुरुवार, 20 अक्टूबर 2011
खाद्य महंगाई दर 10 के पार
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शनिवार, 8 अगस्त 2009
महंगाई की मार सरकार लाचार
दाल की कीमतें पिछले साल के मुकाबले दोगुना हो चुकी हैं। वहीं चावल की कीमतों में तेजी की शुरूआत हो चुकी है। तेल की कीमतें भी पिछले साल के मुकाबले ऊपर ही चढ़ती जा रही हैं।
पिछले साल अरहर दाल प्रति किलो मिल रही थी 48 रुपए में जो इस साल बढ़कर 86 रुपए पर पहुंच चुकी है। मूंग दाल 48 रुपए प्रति किलो से बढ़कर 74 रुपए प्रति किलो पर जा पहुंची है। मूंग साबूत पिछले साल 50 रुपए प्रति किलो मिल रही थी। जो इस इस 70 रुपए प्रति किलो पर पहुंच चुकी है। काला मसूर भी एक साल में 48 रुपए से 70 रुपए पर पहुंच चुकी है। वहीं उड़द साबूत पिछले साल 48 रुपए प्रति किलो मिल रही थी। जो इस साल 68 रुपए प्रति किलो पर पहुंच चुकी है। परमल राइस की कीमत पिछले साल 17 रुपए प्रति किलो थी। जो इस साल बढ़कर 20 रुपए पर पहुंच चुकी है। चीनी 22 रुपए प्रति किलो से बढ़कर 29 रुपए प्रति किलो पर जा पहुंची है।
महंगाई से फिलहाल लोगों को निजात नहीं मिलने वाली है। ऐसा मानना है प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का। क्योंकि इसबार कम मॉनसून की वजह से खरीफ फसलों की बुआई कम हो पायी है। जिसका असर आने वाले दिनों में खाने पीने के सामानों की कीमतों पर देखी जा सकती है। मनमोहन सिंह महंगाई के मुद्दे पर राज्य के मुख्य सचिवों के साथ मीटिंग के बाद ये बात कही। प्रधानमंत्री ने कहा कि राज्यों को अपनी ओर से भी इस मुद्दे से निपटना चाहिए। कालाबाजारी और जमाखोरी को रोका जाना चाहिए। साथ ही प्रधानमंत्री ने मॉनसून की कमी को कुछ हद तक पूरा करने के लिए सूखा प्रभावित जिलों के किसानों को केंद्र की ओर से डीजल पर 50 फीसदी सब्सिडी देने का ऐलान किया है।
इसके साथ ही मनमोहन सिंह ने कही कि सूखे से प्रभावित राज्यों को सेंट्रल पूल से बिजली दी जाएगी। इस तरह की सहायता के ऐलान के बावजूद प्रधानमंत्री के संकेतों से साफ है कि महंगाई की समस्या आने वाले दिनों में और विकराल रुप ले सकती है। अभी तो दाल, चीनी, सब्जियों की कीमतें ही रुला रही हैं। लेकिन आने वाले दिनों में इस लिस्ट में चावल-मक्का जैसे कई और खाने पीने के सामान जुड़ जाएंगे। क्योंकि इस बार खराब मॉनसून की वजह से खरीफ फसलों की जब बुआई ही कम हो पायी है तो फसल कैसे अच्छी हो सकती है। हालांकि प्रधानमंत्री ने कहा कि सरकार के पास अन्न के पर्याप्त भंडार हैं और देश में किसी को भूख से मरने नहीं दिया जाएगा। लेकिन किसानों में सुसाइड करने की शुरूआत कर दी है!
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