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मंगलवार, 30 सितंबर 2008

बेलआउट सीनेट में हुआ ऑलआउट

भारतीय शेयर बाजार में आज सुबह आया तूफान कुछ घंटों के अंदर ही शांत हो गया। और बाजार यू टर्न लेते हुए लाल से हरे निशान में पहुंच गया। ऐसा वित्त मंत्री पी चिदंबरम और सेबी चेयरमैन सी बी भावे के बाजार और अर्थव्यवस्था में सबकुछ ठीक है के आश्वासन के बाद हुआ। उधर अमेरिकी फाइनेंशियल सेक्टर में आया तूफान फिलहाल थमता नजर नहीं आ रहा है। क्योंकि सीनेट ने 700 अरब डॉलर के बेलआउट पैकेज को खारिज कर दिया है। और इसका असर दुनियाभर के बाजारों पर देखा गया। अमेरिकी बाजार में 777 अंकों की ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की गई। यूरोप और एशिया के ज्यादातर बाजार धाराशायी हो गए। और इससे भारतीय बाजार भी अछूता नहीं रहा। बाजार खुलते ही सेंसेक्स 400 अंकों से ज्यादा और निफ्टी 100 अंकों से ज्यादा लुढ़क गए। इसके बाद अफर-तफरी में सेबी के चेयरमैन सी बी भावे को लोगों को ये आश्वासन देना पड़ा कि बाजार में सबकुछ ठीक चल रहा है और घबराने की कोई जरूरत नहीं है। इसके कुछ ही देर बाद वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने भी भारतीय अर्थव्यवस्था पर भरोसा जताया। और कहा कि भारतीय शेयर बाजार मजबूत है। और यहां की रेग्युलेटरी व्यवस्था किसी भी तरह की परेशानी को झेलने में सक्षम है। वित्त मंत्री ने देश के सबसे बड़ी प्राइवेट बैंक के वित्तीय संकट के दौर से गुजरने की अफवाह को पूरी तरह से खारिज कर दिया। पी चिदंबरम के साथ ही रिजर्व बैंक ने भी कहा कि आईसीआईसीआई बैंक की वित्तीय स्थिति पूरी तरह से चुस्त दुरूस्त है।   वित्तमंत्री के इस बयान के बाद आईसीआईसीआई बैंक के शेयरों में जबरदस्त उछाल देखा गया। साथ ही बाजार में भी खरीदारी तेजी से लौटी । जिससे सेंसक्स 264 अंकों की बढ़त के साथ 12860 पर बंद हुआ। और निफ्टी भी 71 अंकों तेजी के साथ 3921 पर बंद होने में कामयाब रहा। उधर फ्रांस में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि अमरीकी वित्तीय संकट के असर से पार पाने के लिए भारत और चीन को मिल कर काम करना चाहिए।

सोमवार, 29 सितंबर 2008

बेलआउट से पहले निवेशकों का बाउलआउट

अमेरिकी कंपनियों को बेलआउट से फायदा होगा या नहीं?... लेकिन इस बेचारे निवेशक का बाउलआउट जरूर हो गया है! अमेरीकी क्रांग्रेस ने वित्तीय संस्थानों के लिए 700 अरब डॉलर के बेलआउट पैकेज की रुपरेखा पर रजामंदी दे दी है। इसके बावजूद एशिया, यूरोप, सहित भारतीय शेयर बाजारों पर इस खबर का असर नहीं दिखा। अमेरिकी फाइनेंशियल सेक्टर में मची तूफान का असर भारतीय शेयर बाजार में देखा जा रहा है। हफ्ते के पहले कारोबारी दिन भारतीय शेयर बाजार में आज भारी गिरावट दर्ज की गई। सेंसेक्स और निफ्टी ने इस साल के सबसे निचले स्तर को छू लिया।  दिनभर के कारोबार के दौरान सेंसेक्स करीब 700 अंक नीचे लुढ़क गया जबकि निफ्टी भी इंट्राडे कारोबार में 200 अंकों से ज्यादा फिसल गया। रियल स्टेट के कुछ शेयर तो करीब 13 फीसदी तक नीचे लुढक गए। बैंक,आईटी, कैपिटल गुड्स, पावर और ऑयल एंड गैस सेक्टर में भी भारी बिकवाली देखी गई। हालांकि आखिरी कारोबारी घंटे में निचले स्तर पर कुछ खरीदारी लौटी। जिससे बाजार निचले स्तर से कुछ ऊपर उठ सका। बाजार बंद होते समय सेंसेक्स 506 अंको की गिरावट के साथ 12595 पर बंद हुआ। जबकि निफ्टी में 135 अंकों की गिरावट दर्ज की गई और ये 3869 पर बंद हुआ। ऐसा नहीं है कि केवल भारतीय बाजारों में ही गिरावट देखी गई हो।  अमेरिकी फाइनेंशियल सेक्टर में छाई मंदी की मार यूरोप और एशिया सहित पूरी दुनिया की बाजारों पर देखा जा रहा है। जापान के निक्केई में करीब 150 अंकों की गिरावट देखी गई। जबकि यूरोप की फुट्सी भी 238 अंकों की गिरावट के साथ बंद हुआ। अमरीकी फाइनेंशियल क्राइसिस से दुनियाभर में निवेशकों के पसीने छूट रहे हैं। कई निवेशक कंगाल हो गए हैं। भारत में तो कुछ ब्रोकरों ने नुकसान के दबाव में अपनी जीवन लीला ही समाप्त कर दी। हालांकि अमेरिकी कांग्रेस ने बैंक और फाइनेंशियल सेक्टर की कंपनियों को दिवालिया होने से बचाने के लिए  700 अरब डॉलर की बेलआउट पैकेज की आउटलाइन पर अपनी मुहर लगा दी है। ये बेल बेलआउट पैकेज तीन चरणों में लागू किया जाएगा। 700 अरब डॉलर के बेलआउट की संभावना के बावजूद दुनियाभर के बाजारों का सेंटीमेंट्स नहीं बदला है। चारो तरफ बिकवाली हावी है। जानकारों का मानना है दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के धाराशायी होने की शुरूआत हो चुकी है। और इसे बचाने के लिए जो बेलआउट पैकेज का ऐलान किया जाने वाला है वो नाकाफी है। और सबसे बड़ी बात ये है कि इस बेलआउट पर अभी प्रतिनिधि सभा में वोटिंग होना बाकी है। अगर ये प्रतिनिधि सभा में पास होगी तभी 700 अरब डॉलर अमरीकी वित्तीय संस्थानों को मिल पाएगा।

बुधवार, 24 सितंबर 2008

अमेरिका में बन चुका है फाइनेंस का बुलबुला

करेंसी हटी दुर्घटना घटी?! मकान के लिए सस्ता लोन बांटने के चलते अमेरिका की चौथी सबसे बड़ी इन्वेस्टमेंट बैंक लीमन ब्रदर्स दिवालियापन की चौखट पर खड़ी है। क्योंकि इस बैंक को अरबों डॉलर का नुकसान हुआ है। पिछली एक तिमाही में ही लीमन ब्रदर्स को 17500 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है। इससे निवेशकों में अफरा तफरी मच गई है। अमेरिका सहित दुनियाभर के बाजारों में इसका असर देखा जा रहा है। भारी नुकसान को देखते हुए लीमन  ब्रदर्स ने अपने दिवालियापन की अर्जी अमेरिकी बैंकरप्सी कोर्ट में दी है। क्योंकि लेहमैन ब्रदर्स को दिवालिएपन से बचाने की सभी कोशिशें नाकाम रही। बार्कलेज बैंक और बैंक ऑफ अमेरिका ने लीमन ब्रदर्स को खरीदने की कोशिश जरूर की लेकिन अमेरिकी सरकार की ओर से सहायता के आश्वासन न मिलने की वजह से बात नहीं बन पाई।  दूसरी ओर दुनिया की सबसे बड़ी ब्रोकरेज फर्म मेरिल लींच की तकदीर कुछ अच्छी थी। क्योंकि पिछली तिमाही में 4.5 अरब डॉलर से भी ज्यादा नुकसान के बावजूद बैंक ऑफ अमेरिका ने मेरिल लींच को खरीदकर उसे डूबने से बचा लिया। इसके बावजूद इन बैंकों में काम करने वाले लोगों के भविष्य पर अभी भी सवालिया निशान लगा हुआ है। मेरिल लींच और लीमन ब्रदर्स में काफी संख्यां में भारत के प्रोफेशनल्स काम करते हैं। यही नहीं अमेरिकी बैंक लीमन ब्रदर्स और दुनिया की सबसे बड़ी ब्रोकरेज फर्म मेरिल लींच की फाइनेंशियल हालत पतली होने से भारत में कम से कम 25000 नौकरियों पर असर पड़ने का अनुमान है।   अमेरिकी के फाइनेंशियल जगत में हुई हलचल का असर अमेरिका सहित पूरी दुनिया में देखा गया। अमेरिकी बाजार 4 फीसदी लुढ़क गया जिससे पेंशन फंड, रिटायरमेंट प्लान्स और पोर्टफोलियो इन्वेस्टमेंट कंपनियों को 32 लाख करोड़ रुपए का नुकसान झेलना पड़ा। एआईजी के शेयर होल्डरों को 20 अरब डॉलर का नुकसान उठाना पड़ा। यही नहीं एआईजी के बेलआउट में यानी इसको दिवालियापन से बचाने के लिए अमरीकी सेंट्रल बैंक को अरबों रुपए खर्च करने पड़े। यूरोपीयन बैंक को स्थिति संभालने के लिए सिस्टम में 70 अरब यूरो डालने को मजबूर होना पड़ा। अमेरिकी सेंट्रल बैंक ने भी  स्थिति को संभालने के लिए दो दिनों में 120 अरब डॉलर सिस्टम में डाल दिया। इस वजह से अगले ही दिन अमरीकी बाजार हल्की बढ़त बनाने में कामयाब रहा। हालांकि जानकार अमरीकी बाजार में बड़ी गिरावट की आशंका जता रहे हैं। अमेरिकी फाइनेंशियल अनिश्चितता से उठे तूफान को कम करने के लिए बैंक ऑफ इंग्लैंड को 20 अरब पाउंड बाजार में उतारना पड़ा। दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था जापान ने अपने बाजार को संभालने के लिए 14 अरब डॉलर सिस्टम में डाल दिए। ऑस्ट्रेलिया और भारत को करीब 3 अरब डॉलर सिस्टम में उतारने पर मजबूर होना पड़ा। वहीं चीन ने 2002 के बाद पहली बार इंटरेस्ट रेट कट किया और इंडोनेशिया ने भी आनन फानन में रेपो रेट में कटौती का ऐलान कर डाला। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि किस तक फाइनेंशियल जगत में एक देश दूसरे से जुड़े हैं। ऐसे में अमेरिका में अगर फिर से कोई बैंक डूबता है या वहां के फाइनेंशियल सेक्टर में कोई उठा पटक होती है तो वो सुनामी बनकर पूरी दुनिया के फाइनेंशियल जगत को हिला कर रख देगा। यानी पूरी दुनिया की नजर अब अमेरिकी बेलआउट पर टिकी है। यानी किस तरह से दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था सबप्राइम क्राइसिस से बने फाइनेंशियल बुलबुले को पैसे बहाकर बचाने में कामयाब होती है। या बचा भी पाती है या नहीं ?