सोमवार, 28 दिसंबर 2009

2009 में बाजार हुआ गुलजार

भारतीय शेयर बाजार के 2009 ऐतिहासिक रहा। इस साल शेयर बाजार में कुछ निवेशकों ने जमकर पैसे डुबाए तो कुछ निवेशकों ने मोटी कमाई की। साल के शुरुआत में दुनियाभर में छाई मंदी का साफ असर भारतयी शेयर बाजार पर देखा गया। कंपनियों के मुनाफे लगातार कम होने लगे इससे घबरकार देशी और विदेशी संस्थागत निवेशकों ने जबरदस्त बिकवाली की। जिसे बाजार धड़ाम से नीचे गिर पड़ा। मार्च 2009 में सेंसेक्स साल भर के अपने न्यूनतम स्तर यानी 8069 पर पहुंच गया। लेकिन देश में फिर से यूपीए की सरकार के गठन होने के बाद एक बार फिर से निवेशकों का विश्वास भारतीय बाजार में लौटा और देखते ही देखते सेंसेक्स दिसंबर तक 17 हजार के जादुई आंकड़े को पार कर गया। 17 दिसंबर को सेंसेक्स 19 महीनों के अपने उच्चतम स्तर यानी 17360 पर बंद हुआ। इस तेजी के सबसे बड़ी वजह हैं विदेशी संस्थागत निवेशक। जिन्होंने इस साल नवंबर तक भारतीय शेयर बाजार में 80500 करोड़ रुपए का रिकॉर्ड निवेश किया। जिसकी वजह से भारतीय शेयर बाजार 1991 से अबतक एक साल में सबसे ज्यादा बढ़त बनाने का रिकॉर्ड कायम कर दिया। अगर दिसंबर 2008 से दिसंबर 2009 तक दुनियाभर के बाजारों से भारतीय बाजार की तुलना करें तो सबसे ज्यादा बढ़त बनाने वाले कुछ देशों में ये शुमार हो चुका है। दुनियाभर में सबसे ज्यादा बढ़त बनाने वाले बाजार में पहले नंबर पर रहा श्रीलंका का बाजार। जो 119 फीसदी बढ़ा। 118 फीसदी बढ़त के साथ दूसरे नंबर पर रहा रुस का बाजार। वहीं 82 फीसदी की बढ़त के साथ तीसरे नबंर पर रहा इंडोनिशाया का बाजार जबकि भारत और ब्राजील का बाजार करीब 80 फीसदी की बढ़त के साथ चौथे नंबर पर रहा। जानकारों का मानना है कि जिस तरह कंपनियों के नतीजों में सुधार हो रहा है। उसे देखकर यही लगता है कि आने वाले साल में बाजार एक बार फिर से 21000 के आंकड़े को छू लेगा।

टीटीडब्ल्यू: टेलीकॉम टैरिफ वॉर 2009

2009 में मोबाइल ग्राहकों की रही चांदी। टेलीकॉम कंपनियां भी हर महीने करीब 1 करोड़ नए मोबाइल ग्राहक जोड़ती रही। लेकिन कंपनियों की कमाई में इजाफा नहीं हो पाया। क्योंकि ग्राहक भले ही बढ़ते गए लेकिन सस्ते प्लान के वजह से कंपनियों को इसका फायदा नहीं मिल सका। जिससे टेलीकॉम कंपनियों का बिगड़ता रहा बैलेंस शीट। यानी कि टेलीकॉम इंडस्ट्री और मोबाइल ग्राहक दोनों के लिए वर्ष 2009 यादगार रहेगा। क्योंकि टैरिफ वॉर के चलते कंपनियों को जहां भारी नुकसान उठाना पड़ा वहीं ग्राहकों को एक से बढ़कर एक सस्ती सकीम्स मिली जिससे उनका मोबाइल बिल काफी कम हो गया।टेलीकॉम कम्पनियों के बीच करीब एक दशक से कॉल दरों में मिनट्स को लेकर जारी घमासान अब सेकेण्ड्स में पहुंच गया। मोबाइल ग्राहकों को दस साल पहले प्रति मिनट करीब 10 रुपए खर्च करने पड़ते थे। जो अब 20 पैसे प्रति मिनट पर सिमट चुकी है। जानकारों का मानना है कि भाले ही कंपनियों की बैलेंस शीट खराब हो रही हो लेकिन इससे मोबाइल ग्राहकों को आने वाले दिनों में भी फायदा मिलता रहेगा। क्योंकि जैसे जैसे टेलीकॉम सेक्टर में कंपनियों की संख्या बढ़ेगी कॉल रेट में करीब 15 फीसदी की और गिरावट आ सकती है। साल 2009 के शुरूआत में मोबाइल ग्राहकों की संख्या करीब 38 करोड़ 50 लाख थी साल के अंत तक बढ़कर करीब 50 करोड़ तक पहुंच गई है। भले ही हर महीने करीब 1 करोड़ नये मोबाइल ग्राहक जुड़ रहे हों लेकिन मोबाइल कंपनियों की कमाई लगातार कम होती जा रही है। और इसका असर टेलीकॉम कंपनियों के शेयरों पर भी देखने को मिल रहा है। इस साल इनके शेयर करीब 27 फीसदी लुढ़क गए। जानकारों की माने तो टेलीकॉम इंडस्ट्री की इस साल सितंबर महीने की तिमाही में कुल कमाई रही 38755 करोड़ रुपए रही, जो कि पिछले साल की तुलना में काफी कम है। जबकि इस दौरान करीब 12 करोड़ 50 लाख नए मोबाइल ग्राहक जुड़ चुके हैं। दिसंबर 2008 की तिमाही में टेलीकॉम कंपनियों की कुल कमाई थी 39408 करोड़ रुपए। जून 2009 में टाटा टेलीसर्विसेज ने जापानी कंपनी डोकोमो के साथ मिलकर प्रति सेकेंड के हिसाब से बिलिंग स्कीम की शुरुआता की। जो कि किसी क्रांति से कम नहीं था। इसके बाद तो एक के बाद एक सभी टेलीकॉम कंपनियों ने इस तरह के सस्ते स्कीम्स की बरसात कर दी। अपने ग्राहकों को बचाए रखने के लिए इस टैरिफ वॉर में एयरटेल और वोडाफोन जैसे दिग्गज कंपनियों को भी कूदने पड़ा। एडीएजी समूह की रिलायंस कम्युनिकेशन ने 50 पैसे प्रति मिनट से शुरु कर 1 पैसे प्रति सेकेंड और एक रूपए में तीन मिनट के बाद 20 पैसे प्रति मिनट की योजना शुरू कर तेजी से ना केवल अपने ग्राहकों को बचाए रखा बल्कि दूसरे टेलीकॉम कंपनियों के ग्राहकों को भी कुछ हद तक अपनी ओर खींचने में कामयाब रहा। हालांकि इतनी सस्ती स्कीम्स की वजह से कंपनी की कमाई लगातार कम होती रही। जमे जमाए टेलीकॉम कंपनियों के लिए भी इस तरह के सस्ते स्कीम्स लागू करने के लिए मजबूर होना पड़ा। क्योंकि नई इंट्री लेने वाली कंपनियों ने कई लुभावने और सस्ते स्कीम्स की झड़ी लगा दी। टेलीकॉम क्षेत्र में कदम रखते ही एक नई कंपनी एमटीएस ने तो आधा पैसा प्रति सेकेंड की नई स्कीम जारी कर पहले से जमे जमाए कंपनियों के हजारों ग्राहकों को अपने साथ ले लिया। कुल मिलाकर अगर कहें तो 2009 मोबाइल ग्राहकों के लिए काफी बेहतर साबित हुआ।

शनिवार, 28 नवंबर 2009

'दुबई वर्ल्ड' से दुनिया परेशान!

दुबई कर्ज संकट ने दुनियाभर के बाजारों को हिला कर रख दिया। दुबई की सरकारी कंपनी दुबई वर्ल्ड ने कर्ज वापस करने के मामले में हाथ खड़े कर दिए हैं। कंपनी ने कर्ज देने वाले फर्म से 6 महीने की मोहलत मांगी है। दुबई की इस कंपनी को 59 अरब डॉलर का कर्ज चुकता करना है। दुनियाभर में छाई आर्थिक मंदी का इस कंपनी पर बहुत बुरा असर पड़ा है। अब जहां पूरी दुनिया मंदी से उबरने में लगी थी। ठीक उसी समय दुबई वर्ल्ड में छाई आर्थिक संकट ने एकबार फिर से सवाल खड़े कर दिए हैं। दुबई वर्ल्ड की आर्थिक स्थिति नाजुक होने की वजह से यूरोप, एशिया सहित दुनियाभर के बाजार लुढ़क गए। हालांकि भारत सरकार का मानना है कि दुबाई कर्ज संकट का भारत पर बहुत कम असर पड़ेगा। और इस संकट से घबराने की जरुरत नहीं है। भारत की कई कंपनियों के पैसे दुबई में लगे हैं। जिसमें प्रमुख हैं।नागार्जुना कंस्ट्रक्शन, लार्सन एंड टुब्रो, पुंज लॉयड, बैंक ऑफ बड़ोदा, वोल्टास, ऑमैक्स, अबन ऑफशोर, स्पाइसजेट और इंडियाबुल्स रियल एस्टेट। दुबई में भारतीय बैंकों और कंपनियों का एक्सपोजर करीब 7000 करोड़ रुपए का आंका जा रहा है। जिसमें सबसे ज्यादा 5000 से 6500 करोड़ रुपए बैंकों के हैं। ऐसा अनुमान है कि बैंक ऑफ बड़ौदा का 5000 करोड़ रुपए और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया का 1500 करोड़ रुपए दुबई वर्ल्ड में लगे हैं। भारतीय कंपनियों में से एलएंडटी का 100 करोड़ रुपए और नागार्जुना कंस्ट्रक्श का 400 करोड़ रुपए का ऋण जोखिम आंका गया है। जब अमेरिका और यूरोप में मंदी की आंधी चल रही थी उस समय एशिया में इसका कम असर देखा जा रहा था। लेकिन अब जहां पूरी दुनिया मंदी से निकलने को तैयार हो रही थी तो एशिया में भूचाल आ गया। दुनिया की सबसे बड़ी निवेश कंपनियों में से एक दुबई वर्ल्ड के पास कर्ज चुकाने के पैसे नहीं हैं। अगर दुबई वर्ल्ड कोई प्राइवेट कंपनी होती तो शायद इतनी हाय तौबा नहीं मचती। लेकिन ये दुबई की सरकारी कंपनी है यानी कंपनी के पास पैसे नहीं होने का मतलब है दुबई सरकार के पास पैसे का नहीं होना। ऐसे में सबसे ज्यादा मुसीबत में फसेंगे यूरोप के बैंक और फाइनेंशियल इंस्टीट्यूट। जिनका दुबई वर्ल्ड में सबसे ज्यादा पैसे लगे हैं। दुबई में हॉलीवुड स्टार ब्रैड पिट और फुटबॉलर डेबिड बेखम ने भी सम्पत्तियों में भारी निवेश किया है। इन सम्पत्तियों के दाम तेजी से लुढ़क गए हैं। बॉलीवुड बादशाह शाहरुख खान के भी करोड़ों रुपए दुबई में लगे हैं। दुबई कर्ज संकट के असर से लंदन में सोना गुरूवार को अब तक की रिकॉर्ड ऊंचाई 1194.40 डॉलर प्रति औंस से 5 फीसदी गिरकर 1140 डॉलर पर पहुंच गया तो कच्चे तेल के भाव 74 डॉलर प्रति बैरल तक लुढ़क गए। जानकारों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग क्षेत्र का दुबई वर्ल्ड में करीब 12 अरब डॉलर का निवेश हो सकता है। हालांकि दुनियाभर के ज्यादातर बैंक,निवेशक या कंपनियां इसे कबूल करने से बच रही हैं। क्योंकि उनके हां करते ही उनके शेयर धड़ाम से गिर पड़ेंगे चाहे वो दुनिया के किसी भी एक्सचेंज में लिस्टेड हों। अब आप जरुर जानना चाहेंगे आखिर क्या है दुबई वर्ल्ड जिसने अपने नाम के अनुसार पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया। दुबई वर्ल्ड एक इन्वेस्टमेंट कंपनी है। जो दुबई सरकार के प्रोजेक्ट्स और इंडस्ट्री को संभालती है। दुबई को पिछल एक दशक में ट्रेडिंग, कमर्स और टूरिज्म हब बनाने में इस कंपनी का अहम योगदान रहा है। पिछले 6 वर्षों की लगातार तेजी के बाद दुबई का रियल एस्टेट मार्केट सुस्त पड़ गया। जिसने इस कंपनी को संकट में फंसा दिया। अब दुबई में घर के खरीदार नहीं मिल रहे हैं। क्योंकि यहां बने घर एंड यूजर्स तक नहीं पहुंच पाए। दुबई और दुनियाभर के ज्यादातर लोगों ने निवेश के नजरिए से इसे खरीदा था। जो अब उसे बेचकर निकलना चाह रहे हैं। लेकिन उन्हें आधी कीमत पर भी खरीदार नहीं मिल रहे हैं। अगर ये घर उन्हें बेचे जाते जो सचमुच वहां रहना चाह रहे हों तो आज ये नौबत ही नहीं आती।

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2009

मिल गए रिलायंस के कुल गैस के खरीदार

भले ही रिलायंस के केजी बेसिन से निकलने वाले गैस की कीमतों को लेकर अभी भी उहापोह की स्थिति बनी हुई हो लेकिन इस बेसिन से निकलने वाले अतिरिक्त गैस के बंटवारे पर मंत्रियों के समूह ने फैसला सुना दिया है। वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी की अध्यक्षता वाले मंत्रियों के समूह ने सबसे ज्यादा गैस पावर सेक्टर को देने पर मुहर लगा दी है। पावर सेक्टर को रिलायंस के कुल अतिरक्त गैस का दो तिहाई हिस्सा दिया जाएगा। मंत्रियों के समूह ने 50 मिलियन यूनिट गैस के बंटवारे पर मुहर लगाई है। और इसे दो हिस्से में बांटा है। 20 मिलियन यूनिट गैस फर्म बेसिस पर दिया जाएगा। यानी जिस सेक्टर के नाम तय कर दिए गए हैं उसे गैस मिलना तय है। वहीं 30 मिलियन यूनिट गैस टेम्परोरी बेसिस पर देने का फैसला किया गया है। यानी उत्पादन होने पर उन्हें गैस दी जाएगी। फर्म बेसिस पर पावर सेक्टर को 13 मिलियन यूनिट गैस दी जाएगी। जबकि रिफाइनरी को 5.384 मिलियन यूनिट गैस मिलेगी। वहीं पेट्रोकेमिकल्स को 1.918 मिलियन यूनिट गैस आवंटित की गई है। फर्टिलाइजर सेक्टर के लिए 0.178 मिलियन यूनिट गैस देने की बात कही गई है। वहीं स्टील सेक्टर को 0.44 मिलियन यूनिट गैस दी जाएगी। टेम्परोरी बेसिस पर पावर सेक्टर को 12 मिलियन यूनटि गैस दी जाएगी। जबकि कैपटिव पावर प्लांट को 10 मिलियन यूनिट गैस दी जाएगी। वहीं सिटी गैस पावर प्लांट को टेम्परोरी बेसिस पर 2 मिलियन यूनिट गैस दी जाएगी। और रिफाइनरी को 6 मिलियन यूनिट गैस मिलेगी। आने वाले दिनों में रिलायंस के केजी बेसिन के डी 6 ब्लॉक से गैस के उत्पादन में जबरदस्त तेजी देखने को मिलेगी। औऱ इस तेजी के पीछ छोटे भाई अनिल अंबानी के आरोप का भी अहम योगदान है। अनिल अंबानी ने बड़े भाई मुकेश अंबानी की कंपनी पर जानबूझकर गैस कम उत्पादन करने का आरोप लगाया था। डी 6 ब्लॉक से हर दिन अधिकतम 90 मिलियन यूनिट गैस की उत्पादन हो सकती है। जिसके खरीदारों की लिस्ट तैयार कर दी गई है। 40 मिलियन यूनिट गैस पहले ही पावर और यूरिया सेक्टर को आवंटित किया जा चुका है। बाकी बचे 50 मिलियन यूनिट गैस के भी खरीदार तय हो गए हैं। फिलहाल रिलायंस 40 मिलियन यूनिट गैस का उत्पादन हर दिन कर रही है। और दिसंबर तक ये बढ़कर 60 मिलियन यूनिट तक पहुंच जाएगा। उसके बाद ये अपने अधिकतम स्तर 90 मिलियन यूनिट प्रति दिन तक पहुंच सकता है। अब केवल इंतजार है प्रोडक्शन बढ़ने और कीमत तय होने की।

रॉबिन रैना: ग्रोथ का रॉबिन हुड

फास्टेस्ट ग्रोथ वाली फॉर्च्यून 100 कंपनियों में एबिक्स नं.4 कंपनी की शुरुआत करना ही अपने आप में एक बड़ी बात होती है। फिर उसको सफल बनाने के लिए एड़ी चोटी का पसीना बहाना पड़ता है। और बड़ी मुश्किल औऱ मेहनत के बाद 1 फीसदी से भी कम कंपनियां सफलता का स्वाद चख पाती हैं। और अगर फॉर्च्युन की लिस्ट में जगह बनाने की बात करें तो दशकों तक चलने के बाद भी बड़ी मुश्किल से हजारों में से कोई एक कंपनी फॉर्च्युन की लिस्ट में अपनी जगह बना पाती है। और अगर कोई कंपनी फॉर्च्युन की लिस्ट में जगह बनाने में कामयाब होती है तो उसे दुनियाभर में एक बड़ी बात मानी जाती है। लेकिन एक अप्रवासी भारतीय रॉबिन रैना की कंपनी ने बिजनेस जगत में ऐसा कर दिखाया है। रॉबिन की सॉफ्टवेयर कंपनी ने ग्रोथ के मामले में माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, नोकिया जैसी दुनिया की दिग्गज कंपनियों को पीछे छोड़ दिया है। एबिक्स दुनिया में सबसे तेज गति से बढ़ने वाली कंपनियों की लिस्ट में शुमार हो गई है। - सबसे तेज ग्रोथ वाली फॉर्च्युन 100 कंपनियों की लिस्ट में एबिक्स को चौथे स्थान पर रखा गया है। एबिक्स दुनियाभर में ऑन डिमांड सॉफ्टवेयर और ई कॉमर्स सॉल्युशन मुहैया कराती है। - जबिक पहले नंबर पर है कनाडा की कंपनी रिम, जो कि ब्लैकबेरी फोन बनाती है । - वहीं दूसरे नंबर पर है चिप बनाने वाली अमेरिकी कंपनी सिग्मा डिजाइन।अंतरराष्ट्रीय बाजारों में ब्लू रे की बढ़ती मांग का फायदा इस कंपनी को मिल रहा है। - तीसरे पायदान पर है एक चाइनीज कंपनी शोउ डॉट कॉम । इस कंपनी का अपना एक सर्च इंजन है साथ ही इसकी चांगयोऊ गेम साइट बहुत तेजी से बढ़ रही है। - आईफोन और आईपॉड बनाने वाली कंपनी एप्पल है 35वें स्थान पर। - जबकि दुनिया की सबसे बड़ी सर्च इंजन चलाने वाली कंपनी गूगल है 68वें पायदान पर। - फॉर्च्युन की सबसे तेज बढ़ने वाली 100 कंपनियों में केवल एक भारतीय कंपनी इंफोसिस को शामिल किया गया है। इंफोसिस आखिरी स्थान पर यानी 100वें नंबर पर है। एक अप्रवासी भारतीय की कंपनी एबिक्स ने ना केवल भारत की सभी कंपनियों को ग्रोथ के मामले में पीछे छोड़ा है बल्कि दुनिया की कई दिग्गज कंपनियों को भी पानी पिला दिया है। एबिक्स ने गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, नोकिया और एप्पल जैसी दुनिया की नामी गिरामी कंपनियों को ग्रोथ के मामले में काफी पीछे छोड़ दिया है। एबिक्स ने दुनियाभर में तेजी से बढ़ने वाले इंश्योरेंस सेक्टर को टार्गेट किया है। जिसका फायदा इस कंपनी को मिलने लगा है। शायद यही वजह है कि फॉर्च्युन ने दुनिया में निवेश के लिए सबसे बेहतर कंपनियों की लिस्ट में एबिक्स को दूसरे नंबर पर रखा है। एबिक्स इंश्योरेंस एक्सचेंज का भी काम करती है। एबिक्स को इस ऊंचाई तक पहुंचाने में कंपनी के सीईओ रॉबिन रैना का अहम योगदान रहा। अप्रवासी भारतीय रॉबिन रैना अमेरिका के अटलांटा से एबिक्स को चलाते हैं। एबिक्स दुनियाभर में ऑन डिमांड सॉफ्टवेयर की सप्लाई करती है। साथ ही दुनियाभर में इंश्योरेंस सेक्टर के लिए ई कॉमर्स सर्विस भी मुहैया कराती है। एबिक्स की भारत, सिंगापुर, अमेरिका,न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा सिहत दुनियाभर में फिलहाल 23 ऑफिसेस हैं। आने वाले दिनों में भारत में जैसे जैसे इंश्योरेंस सेक्ट में तेजी एबिक्स की पकड़ इस इंडस्ट्री पर और मजबूत होगी।

मंगलवार, 27 अक्टूबर 2009

क्रेडिट पॉलिसी का ऐलान

महंगाई और ग्रोथ के बीच तालमेल की कोशिश रिजर्व बैंक ने क्रेडिट पॉलिसी का ऐलान कर दिया है। क्रेडिट पॉलिसी की दूसरी तिमाही की समीक्षा करते हुए रिजर्व बैंक ने किसी भी अहम दरों के साथ छेड़ छाड़ नहीं किया है। - केवल एसएलआर में 1 फीसदी का इजाफा किया है । जिससे एसएलआर 24 फीसदी से बढ़कर 25 फीसदी पर पहुंच गया है। - एसएलआर में एक फीसदी की बढ़ोतरी की वजह से सिस्टम से 30000 करोड़ रुपए बाहर हो जाएंगे। - और इससे सरकार को महंगाई पर लगाम लगाने में मददद मिलेगी। - बैंक रेट, सीआरआर, रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं किया गया है। - सीआरआर 5 फीसदी, रेपो रेट 4.75 फीसदी, रिवर्स रेपो रेट 3.2 फीसदी और बैंक रेट 6 फीसदी पर बना रहेगा। - रिजर्व बैंक ने वित्त वर्ष 2010 के लिए जीडीपी ग्रोथ रेट 6 फीसदी रहने का अनुमान लगया है। - जबकि रिजर्व बैंक ने अगले साल मार्च तक महंगाई दर के 6.5 फीसदी पर पहुंचने की आशंका जताई है। हालांकि वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी रिजर्व बैंक के जीडीपी विकास दर के अनुमान से सहमत नहीं हैं। उनका मानना है कि रिजर्व बैंक ने विकास दर के जो अनुमान लगाए हैं वो कुछ ज्यादा ही कंजरवेटिव हैं। औद्योगिक चैंबर्स में क्रेडिट पॉलिसी को लेकर मिली जुली प्रतिक्रिया मिली है। महंगाई और ग्रोथ को ध्यान में रखते हुए आरबीआई इस क्रेडिट पॉलिसी का ऐलान किया है। ग्रोथ में जान फूंकने के लिए ज्यादातर अहम दरों को नहीं टच किया गया है। क्योंकि मंदी के बाद मॉनसून में कमी और देश के कुछ इलाकों में बाढ़ की स्थिति से कृषि क्षेत्र पर असर पड़ने की आशंका है। जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों की कमाई कम हो सकती है। और इसका असर ये होगा कि पहले से सुस्त पड़ा डिमांड और सुस्त हो जाएगी। ऐसे में अहम दरों को नहीं छूते हुए केवल एसएलआर बढ़ाकर आरबीआई ने महंगाई पर कुछ लगाम कसने की कोशिश की है। साथ ही ग्रोथ का रास्ता भी खुला रखा है।

शनिवार, 24 अक्टूबर 2009

9 बजे से 5 बजे तक खरीदो शेयर!

मार्केट रेग्युलेटर सेबी ने शेयर बाजार के कारोबार समय में ढील देते हुए इसे 9 बजे सुबह से 5 बजे शाम तक बढ़ाने की इजाजत दे दी है। काफी समय से बीएसई,एनएसई कारोबार के समय की सीमा में छूट की मांग कर रहे थे। समय सीमा बढ़ने से ज्यादातर निवेशकों को फायदा होगा। निवेशक यूरोपीय बाजार के खुलने के बाद ज्यादा समय तक भारतीय बाजार में कारोबार कर पाएंगे। साथ ही अपने काम निपटाकर आराम से बाजार में खरीद फरोख्त कर पाएंगे। फिलहाल भारतीय शेयर बाजार सुबह 9.55 में खुलते हैं और शाम को 3.30 बजे बंद हो जाते हैं। हालांकि बीएसई या एनएसई ने फिलहाल समय सीम बढ़ाने का ऐलान नहीं किया है। लेकिन सेबी की हरी झंडी मिल जाने के बाद ऐसा अनुमान लगाया जा रहा कि जल्द ही दोनों एक्सचेंज इसकी घोषणा करेंगे।