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मंगलवार, 5 जुलाई 2022

फॉग नहीं यूरोप में गैस और एशिया में क्रूड चल रहा है

 

 

जी हां सही सुना आपने, आजकल फॉग का नहीं नेचुरल गैस की चर्चा पूरी दुनिया में चल रही है। नेचुरल गैस की कमी से यूरोपीय देश कराह रहे हैं। नेचुरल गैस के चारों ओर यूरोप की इकॉनोमी का तानाबाना बुना हुआ है। नेचुरल गैस की किल्लत से यूरोपीय देश मंदी की कगार पर खड़े हैं। विंटर सीजन आते आते वहां स्टोरेज शुरू हो जाती है जिससे वहां गैस का डिमांड और बढ़ जाता है। ऐसे में जहां अभी यूरोप को नेचुरल गैस की सप्लाई बढ़नी चाहिए थी लेकिन हो रहा है इसका बिल्कुल उल्टा, वहां गैस की भारी किल्लत बनी हुई है। यही वजह है कि पिछले एक साल में वहां नेचुरल गैस की कीमतों में 700 परसेंट से ज्यादा की तेजी आ चुकी है। यही नहीं फिलहाल इसकी कीमतों में कोई नरमी के भी संकेत नहीं दिख रहे हैं।

रूस ने यूरोप को होने वाली गैस सप्लाई में कटौती कर दी है। इसके साथ ही वो जर्मनी को जिस नोर्ड स्ट्रीम से गैस की सप्लाई करता है उसे 11 जुलाई से मेंटेनेंस के नाम पर
बंद कर है। इससे जर्मनी के पसीने छूट रहे हैं। जर्मनी को ये डर है कि मेंटेनेंस के नाम पर सप्लाई रोकने के बाद शायद
रूस फिलहाल इसे शुरू न करे। दुनिया के सुपर सात देशों में गैस को लेकर माथापच्ची जारी है लेकिन कोई रास्ता निकलता नहीं दिखाई दे रहा है।

पिछले दिनों एक ब्लास्ट की वजह से अमेरिका के टेक्सस स्थित नेचुरल गैस टर्मिनल पर काम ठप है। जिससे यूरोप में एलएनजी की भारी किल्लत हो रही है। क्योंकि इसी टर्मिनल से अमेरिका यूरोप को गैस सप्लाई करता है। इस टर्मिनल को इस साल के आखिर तक फिर से शुरू किया जा सकेगा। ऐसे में इस नए जमाने के कोल्ड वार में नेचुरल गैस एक अहम भूमिका निभा रहा है। और इस मामले में रूस को अपर हैंड मिला हुआ है। कच्चे तेल की कीमतों में भी नरमी नहीं देखी जा रही है। ब्रेंट का भाव अभी 110 डॉलर के ऊपर बरकरार है। 

ऐसे में यूरोप के बाद दूसरे नंबर पर एशिया ही प्रभावित हो रहा है और भारत सहित कई एशियाई
देशों पर इसका असर देखने को मिल रहा है। भारत अपनी ज़रूरतों का करीब 80 फीसदी
कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। ऐसे में भारत को अपनी जरूरतों को पूरा करने
के लिए पेट्रोल-डीजल-एटीएफ एक्सपोर्ट पर लगाम और विंडफॉल टैक्स के साथ साथ दूसरे विकल्पों पर भी
ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है।

सोमवार, 30 जनवरी 2012

ओबामा को दादा ने दिया करारा जवाब

केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने चेतावनी देते हुए कहा है कि अमेरिका में आउटसोर्सिंग बंद होने से अमेरिका और भारत दोनों को घाटा होगा। साथ ही वित्त मंत्री ने साफ कर दिया कि अमेरिका और यूरोपीय देशों के प्रतिबंध के बावजूद भारत ईरान से तेल खरीदता रहेगा।

वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने आटसोर्सिंग और ईरान मुद्दे पर भारत की नीति को दो टूक सब्दों में अमेरिका के सामने रखा है। वित्त मंत्री ने कहा कि अगर अमेरिकी कंपनियों को आउटसोर्सिंग करने से रोका जाएगा तो दोनों देशों की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ेगा। प्रणब मुखर्जी ने अमेरिका की संरक्षणवादी नीतियों को लेकर चिंता जताई है।

अमेरिका के दो दिनों के दौरे के आखिरी दिन मुखर्जी ने कहा कि सभी देश इस बात के लिए आज़ाद हैं कि वे अपनी जरूरतों के हिसाब से नीतियां बनाएं। लेकिन वो नीतियां संरक्षणवाद को बढ़ावा देने वाली नहीं होनी चाहिए। मुखर्जी ने इस बात पर भी जोर दिया कि विश्व व्यापार संगठन इस कोशिश में लगा हुआ है कि पूरी दुनिया में आसानी से एक जगह से दूसरी जगह वस्तुओं और सेवाओं को उपलब्ध कराया जाए।

वहीं दूसरी ओर तमाम दबावों के बावजूद ईरान के मुद्दे पर वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने साफ किया है कि भारत ईरान से तेल खरीदता रहेगा। अमेरिका और यूरोपीय संघ की पाबंदियों के बावजूद ईरान से कच्चे तेल के व्यापार पर रोक नहीं लगाया जाएगा। वित्त मंत्री ने कहा कि भारत के लिए ईरान से होने वाले तेल आयात में कटौती का निर्णय लेना संभव नहीं है। भारत में तेजी से बढ़ रही ईंधन की जरूरतों को पूरा करने के लिए ईरान की अहम भागीदारी है। भारत करीब 80 फीसदी तेल आयात करता है। जिसमें से 12 फीसदी तेल ईरान से आयात होता है।

ऐसे में वित्त मंत्री का अमेरिका का ये दौरा काफी सकारात्म नज़र आ रहा है। क्योंकि प्रणब मुखर्जी ने ईरान और आउटसोर्सिंग पर भारतीय चिंताओं को खुलकर अमेरिका के सामने रख दिया है।