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बुधवार, 7 दिसंबर 2022

RBI क्रेडिट पॉलिसी की 10 अहम बातें

 

1.   RBI ने ब्याज दरें 0.35% बढ़ाई

2.   रेपो रेट में 0.35% की बढ़ोतरी

3.   रेपो रेट 0.35% बढ़ाकर 6.25%

4.   रेपो रेट 5.90% से बढ़कर 6.25%

5.   इस साल 5वीं बार दरों में बढ़ोतरी

6.   SDF रेट 5.65% से बढ़ाकर 6% किया

7.   MSF रेट 6.15% से बढ़ाकर 6.5% किया

8.   FY23 GDP ग्रोथ अनुमान 7% से घटाकर 6.8% किया

9.   FY23 रिटेल महंगाई अनुमान 6.7% पर बरकरार

10.     2 दिसंबर तक विदेशी मुद्रा भंडार $56,120 Cr

गुरुवार, 28 जुलाई 2022

US फेड ने ब्याज दरें फिर बढ़ाईं



42 साल के शिखर पर पहुंच चुकी महंगाई को कम करने के लिए US फेड ने लगातार दूसरी बार ब्याज दरों में 75 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी कर दी है। हालांकि बहुत पहले से इसकी उम्मीद जताई जा रही थी शायद यही वजह है कि बाजार के लिए निगेटिव इस खबर के बाद भी बाजार में हरियाली छा गई। NASDAQ में मार्च 2020 के बाद सबसे ज्यादा तेजी दिखी। 4 परसेंट से ज्यादा की तेजी के साथ नैसडेक 4 हजार के पार बंद हुआ। वहीं DOW में भी 1.3 परसेंट से ज्यादा और S&P में 2.5 परसेंट से ज्यादा तेजी दर्ज की गई। S&P 4000 के पार बंद हुआ।  

 अमेरिका में लगातार चौथी बार ब्याज दरें बढ़ी हैं। इसके साथ ही अमेरिका में ब्याज दर 2.25%-2.5% के बीच पहुंच चुकी है। अमेरिकी फेड के चेयरमैन जेरोम पॉवेल ने कहा है कि आगे भी ब्याज दरें बढ़ेंगी लेकिन इसकी रफ्तार इतनी ज्यादा नहीं होगी। वहीं पॉवेल ने मंदी की खबर को सिरे से खारिज कर दिया है।

भारतीय बाजार के लिए ये राहत की खबर है। क्योंकि ब्याज दर बढ़ने की वजह से पिछले कई महीनों से विदेशी संस्थगत निवेश का पलायन जारी है। ऐसे में कई जानकारों का मानना है कि अमेरिकी महंगाई अपनी चरम छू चुकी है और अब उसमें गिरावट दिखनी शुरू हो जाएगी। साथ ही अगले साल से अमेरिकी में ब्याज दरों में कटौती भी होने लगेगी। और ब्याज दरें कम होने पर फिर से विदेशी संस्थागत निवेशकों का निवेश भारतीय बाजार में लौटने लगेगा।

गुरुवार, 7 जुलाई 2022

महंगाई, मंदी और स्टैगफ्लेशन में क्या है सबसे ज्यादा खतरनाक

 


कोरोना के दो साल की भयावह स्थिति के बाद रूस-यूक्रेन युद्ध ने दुनियाभर की अर्थव्यव्स्था को नुकसान पहुंचाया है। कोरोना काल में जहां फैक्ट्री प्रोडक्ट दुकानों में जस के तस पड़े रह गए थे। दुनियाभर के देशों की जीडीपी विकास दर माइनस में चली गई थी। दुनियाभर में जीवन की चिंता अर्थव्यवस्था से बड़ी हो गई थी। लेकिन कोरोना की तीन लहरों के बाद दुनियाभर की अर्थव्यवस्था पटरी पर आने लगी थी। वैक्सीनेशन ने जीवन के लिए कवच का काम किया। फैक्ट्रियां धीरे- धीरे खुलने लगी। लोगों को रोजगार वापस मिलने लगा लेकिन इसी बीच रूस-यूक्रेन युद्ध ने स्थिति को एकबार फिर से बैकट्रैक पर ढ़केल दिया। अब स्थिति ये है दुनिया ग्लोबल मंदी की ओर  बढ़ती दिखने लगी है।

 

इन्फेलशन और रिसेशन के साथ ही एक और शब्द स्टैगफ्लेशन की चर्चा आजकल जोरों पर। स्टैगफ्लेशन यानी महंगाई और मंदी साथ-साथ यानी कि आम लोगों पर दोहरी मार। एक ओर महंगाई की वजह से बैंकों ने ब्याज दरों को बढ़ाना शुरू कर दिया है जिससे आम लोगों पर ईएमआई का बोझ बढ़ने लगा है। वहीं महंगाई की वजह से खाने-पीने के सामान के साथ ही ईंधन और दूसरी ज़रूरत के सामान महंगे हो चुके हैं।

 

IMF प्रमुख Kristalina Georgieva ने अगले साल ग्लोबल मंदी की आशंका जताई है। आईएमएफ का मानना है कि इस साल अप्रैल से दुनियाभर के कई दिग्गज देशों के इकोनॉमी में सुस्ती आई है। 2022 का ग्लोबल इकोनॉमी ग्रोथ 3.6% के अनुमान से और नीचे फिसल सकता है। यूक्रेन-रूस युद्ध का असर बढ़ता जा रहा है। अमेरिका में महंगाई 40 साल के उच्चतम स्तर पर तो यूरोप में 20 साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच चुका है। भारत में भी होलसेल महंगाई दर एक दशक के उच्चतम स्तर पर पहुंच चुका है। 1 परसेंट महंगाई बढ़ने से जितना नुकसान लोगों को होता है उसके करीब पांच गुना नुकसान एक परसेंट बेरोजगारी दर बढ़ने से होता है। ऐसे में अगर मंदी या स्टैगफ्लेशन आई तो लोगों का रोजगार छूटेगा। फैक्ट्रियां बंद होने लगेंगी, शोरूम का किराया निकालना मुश्किल हो जाएगा। बाजार में सामान तो होंगे लेकिन लोगों के पास उसे खरीदने के लिए पैसे नहीं होंगे।