बुधवार, 7 मई 2008

ओके टाटा : हॉर्न प्लीज : हर सेग्मेंट में मिलेंगे

ऑटो सम्राट टाटा

कभी दुनियाभर में धूम मचा देने वाली कंपनी लैंडरोवर और जगुआर आखिरकार अगले महीने पूरी तरह टाटा की झोली में आ जाएगी। टाटा मोटर्स ने कार बनाने वाली ब्रिटेन की कंपनी जगुआर और लैंड रोवर को खरीद लिया है। टाटा ने इन कंपनियों को फोर्ड मोटर्स से खरीदा है। क्योंकि अमेरिकी मोटर कंपनी फोर्ड के हाथों में इसका मालिकाना हक था। टाटा को इस बड़ी शॉपिंग के लए 2.3 अरब डॉलर खर्च करने पड़े । अगले महीने तक इस डील की प्रक्रिया को पूरा कर ली जाएगी। फोर्ड को टाटा से मिलने वाली रकम में से 60 करोड़ रुपए लैंड रोवर और जगुआर के पेंशन फंड को देने होंगे। फोर्ड ने करीब 20 साल पहले 2.5 अरब डॉलर में जगुआर को और 8 साल पहले 2.7 अरब डॉलर में लैंड रोवर को खरीदा था। पिछले एक साल से जेएलआऱ(जगुआर- लैंड रोवर) के पीछे टाटा मोटर्स हाथ धो कर पड़ी थी। और इस रेस में टाटा ने भारतीय कंपनी महिंद्रा एंड महिंद्रा सहित दुनिया की कई कंपनियों को पीछे छोड़ दिया। जगुआर पिछले कई सालों से नुकसान में चल रहा है जबकि लैंड रोवर का मुनाफा भी नाममात्र है। इसलिए फोर्ड ने इनदोनों कंपनियों को बेच दिया। इसके बदले मिले पैसे से फोर्ड दुनयाभर में अपनी ब्रांड को और मजूबत करेगी।
टाटा : द ऑटो किंग

उधर टाटा इन दोनों कंपनियों के साथ ही ऑटो इंडस्ट्री की लगभग सभी सेग्मेंट में अपनी पैठ बना लेगी। चाहे लखटकिया नैनो हो या इंडिका या सूमो या एवियो या ट्रक या बस या हवा से बातें करने वाली लैंड रोवर और जगुआर। कमर्शिय गाड़ियों में पहले से ही देश में धाक जमा चुकी टाटा ने कोरियाई कंपनी देवु की कमर्शियल गाड़ियों को खरीदकर दुनिया में अपनी पहचान बना ली है। यानी चाहे भारी समान ढ़ोना हो या हवा से बातें करना आप टाटा को टाटा कर आगे नहीं निकल सकते।

क्या है लैंड रोवर?
हवा से बातें करने वाली रैंज रोवर और डिस्कवरी जैसी स्पोर्ट्स यूटिलिटी व्हेकिल बनाने वाली कंपनी लैंड रोवर की जन्म इंग्लैंड के गायदोन में 30 अप्रैल 1948 में हुआ। लैंड रोवर एलआर टू जैसी छोटी कार भी बनाती है। साथ ही मल्टी पर्पस व्हेकिल यानी एमयूवी के क्षेत्र में भी इसका बोलवाला है। ये कंपनी प्रॉफिट में है लेकिन इतना कम कि किसी प्रोडक्ट रिन्यूअल प्रोग्राम को फाइनेंस करना भी इसके बूते में नहीं है। पिछले साल कंपनी की बिक्री में 2006 के मुकाबले 18 फीसदी का इजाफा हुआ है। और इसकी बिक्री बढ़कर सवा दो लाख गाड़ियों तक पहुंच चुकी है। इस कंपनी की शुरूआत रोवर नाम से हुई। साथ ही इसकी गिनती एसयूवी बनाने वाली सबसे पुरानी कंपनियों में होती है।

क्या है जगुआर?
जगुआर का नाम लग्जरी स्पोर्ट्स सेडान बनाने वाली कंपनी की तौर पर जाना जाता है। इसकी लिटिल एक्स टाईप सेडान कार ने 2001 में लांच होते ही पूरी दुनिया में धूम मचा दी थी। और इसकी बिक्री एक साल में 1.5 लाख कार तक पहुंच गई। जबकि जगुआर की कुल कारों की बिक्री 2 से 3 लाख कारें ही थी। जानकार लिटिल एक्स टाईप सेडान कार में काफी पोटेंशियल देख रहे है। आने वाले दिनों में ये कार बीएमडब्ल्यू थ्री सीरीज को टक्कर दे सकती है। इसके बाद कंपनी ने एस टाईप कार लांच की। जिसको बाद में बदलकर एक्स एफ कर दिया गया। और पूरी दुनिया में एक साथ इसे लांच किया गया। लेकिन जापानी और जर्मन कारों मर्सीडीज, बीएमडब्ल्यू, ऑडी और तो और लेक्सस से भी इसे कड़ी टक्कर मिल रही है। जगुआर को 1922 में स्वैलो साईडकार कंपनी की तौर पर लांच किया गया था। 1945 में इसका नाम बदल कर जगुआर कर दिया गया। 2006 के मुकाबले पिछली साल कंपनी 16 फीसदी कम यानी केवल 60,485 कारें बेची हैं। और फिलहाल ये कंपनी नुकसान में चल रही है। फोर्ड ने 1989 में इसे 2.5 अरब डॉलर में खरीदा। और तब से फोर्ड को 10 अरब डॉलर की नुकसान हो चुकी है।

बुधवार, 24 अक्टूबर 2007

कार्बन क्रेडिट: धुंए का पैसा


जब प्रकृति का डंडा चलने लगता है तो कोई नहीं बच पाता है। चाहे वो भूकंप हो या सुनामी। इससे बचाव के लिए कोई मिसाइल डिफेंस सिस्टम या एटम बम काम नहीं आते हैं। जबकि ये प्राकृतिक आपदाएं ग्लोबल वॉर्मिंग के प्रकोप के लाखवें हिस्से से भी कम हैं। तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि ग्लोबल वॉर्मिंग का क्या असर हो सकता है। अगर ग्लोबल वॉर्मिंग को नहीं रोका गया तो सैकड़ों देशों को जल समाधि लेने को मजबूर होना पड़ेगा। और फिर एक दिन ये धरती आग के गोले में तब्दील हो जाएगी। इसका अंदाजा हमें और अमेरिका, ब्रिटेन, जापान जैसे उन देशों को भी है जिन्होंने पर्यावरण को इस दहलीज पर लाने में सबसे अहम योगदान किया है। केवल अमेरिका ही एक तिहाई ग्लोबल वॉर्मिंग का जिम्मेदार है।

आज विकसित देशों के पास सबकुछ है। यहां तक की उनके स्लम्स एरिया (झुग्गी बस्ती) के मकानों में भी सेंटरलाइज एसी होते हैं। जो कि दिन दोगुनी रात चौगुनी ग्रीन हाउस गैस उगलती रहती हैं। लेकिन अब विकसित देशों को इस बात का डर है कि कहीं उनका ऐशो आराम, हराम में न बदल जाए। और ये तभी होगा जब भारत और चीन जैसे देश विकसित बनने के लिए उनका रास्ता अपनाएंगे। क्योंकि उन्होंने विकास के क्रम में ग्रीन हाउस गैसों और कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन को रोकने के लिए कुछ नहीं किया था। आज विकसित देशों के पास सबकुछ है लेकिन गर्दन पर ग्लोबल वॉर्मिंग की तलबार भी लटक रही है।

ग्लोबल वॉर्मिंग के खतरे से बचने के लिए 1997 में जापान के क्योटो शहर में हुए वर्ल्ड अर्थ समिट में से क्योटो प्रोटोकॉल निकलकर सामने आया। आज इसके 150 से ज्यादा देश सदस्य हैं। इन देशों ने मिलकर 2012 तक ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को 1990 के स्तर से 5.2 फीसदी नीचे लाने का लक्ष्य रखा है। इसी क्योटो प्रोटकॉल में कार्बन क्रेडिट का जन्म हुआ।

कार्बन क्रेडिट यानि प्रकृति को डॉलर में तौलना। इसे ऐसे समझना बेहतर होगा। भारत, चीन, ब्राजील या तीसरी दुनिया के किसी देश में अगर कोई प्रदूषण फैला रहा है। हालांकि वो देश अनजाने में, अपने लोगों के जीवन यापन के लिए ऐसा कर रहे हों। पर उसका नुकसान पूरी दुनिया को हो रहा है। लेकिन इसका सबसे ज्यादा दुख विकसित देशों को हो रहा है क्योंकि इसे रोकने के लिए उनका कोई भी ताकत काम नहीं आ रहा है।

अब ये विकसित देश, तीसरी दुनिया के देशों को ये समझाने में जुट गए हैं कि प्रदूषण से सभी का नाश हो जाएगा। जो कि बिल्कुल सच है। लेकिन सवाल ये पैदा होता है कि जो किसान जंगल काटकर लकड़ी बेचकर अपना जीवन यापन करते हैं। अगर उन्हें दूसरा सहारा नहीं मिला और उसने लकड़ी काटना भी छोड़ दिया तो वे तो आज ही मर जाएंगे। जबकि ग्लोबल वॉर्मिंग से मरने में उसे कुछ वर्ष लगेंगे या शायद इस जनम में ग्लोबल वार्मिंग से न भी मरें।

इसी का उपाय कार्बन क्रेडिट में ढूंढा गया है। यानि अगर आप कार्बन डाइऑक्साइड का कम उत्सर्जन करेंगे तो आपको इसके बदले कार्बन क्रेडिट दिए जाएंगे। जिसे बेचकर आप पैसे कमा सकते हैं। यूनाइटेड नेशन की देखरेख में सदस्य देशों और उनके संस्थानों को कार्बन क्रेडिट इश्यू किया जाता है। ये क्रेडिट क्लीन डेवलपमेंट मैकेनिज्म(CMD)के जरिए तय किया जाता है। अगर किसी कंपनी ने कार्बन डाइऑक्साइड घटाने के लिए अच्छी तकनीक का सहारा लिया है। तो उसके बदले उसे कितना कार्बन क्रेडिट मिलना चाहिए ये फैसला सीएमडी के जरिए ही होता है। साथ ही सीएमडी के तहत ही ज्यादा कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन करने वाली कंपनियां भी कार्बन क्रेडिट खरीदकर अपना उत्पादन जारी रख सकती हैं। स्टील,चीनी,सीमेंट और फर्टिलाइजर बनाने वाली कंपनियां ज्यादा कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन करती हैं।

डॉक्टर साहब,कार्बन क्रेडिट के चक्कर में मेरे बेटे ने सांस छोड़ना ही बंद कर दिया!

अगर कोई कंपनी एक टन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन कम कर रही हैं तो उसे एक कार्बन क्रेडिट मिलेगा। और एक कार्बन क्रेडिट की कीमत इस समय अंतरराष्ट्रीय बाजार में करीब 20 डॉलर चल रहा है। फिलहाल अमेरिका में शिकागो क्लाइमेट एक्सचेंज और ब्रिटेन में यूरोपियन क्लाइमेट एक्सचेंज में कार्बन क्रेडिट का कारोबार होता है। लेकिन बहुत जल्द ही इसका कारोबार भारत के मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज यानी एमसीएक्स में शुरू होने का अनुमान है।

फिलहाल विश्व में 30 अरब डॉलर का कार्बन क्रेडिट का बाजार है। जिसका अगले कुछ सालों में 100 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। इतने बड़े बाजार में भारत की 30 परसेंट की भागीदारी हो सकती है।

2 साल पहले भारत में कार्बन क्रेडिट का लेन-देन शुरू हो चुका है। और इन दो सालों में घरेलू कंपनियों ने कार्बन क्रेडिट बेचकर 50 करोड़ डॉलर कमाए हैं। अभी हाल ही में जेएसडब्ल्यू स्टील के एक प्रोजेक्ट को 40 लाख का कार्बन क्रेडिट मिला है। जो कि भारत में अबतक का सबसे बड़ा कार्बन क्रेडिट है।

कुल मिलाकर कार्बन क्रेडिट की कहानी यही है कि हर देश के लिए कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन की एक सीमा तय कर दी गई है। अमेरिका और यूरोप के कई देश इस सीमा से ऊपर चल रहे हैं। इसलिए उन्हें कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन में कटौती करनी है। नहीं तो फैक्ट्री चलाते रहने के लिए उन्हें हर साल कार्बन क्रेडिट खरीदने होंगे। और ये क्रेडिट भारत और चीन जैसे देशों से ही वो खरीदेंगे। क्योंकि भारत और चीन के लिए जो उत्सर्जन की सीमा तय की गई है। उससे ये दोनों देश काफी कम कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन कर रहे हैं। भारत अगर अभी से सचेत तरीके से औद्योगिकीकरण की गाड़ी आगे बाढ़ाता है। और सही तकनीक का उपयोग करता है। तो हमेशा इस देश में कार्बन क्रेडिट की बौछार होती रहेंगी। और पर्यावरण को भी फायदा पहुंचता रहेगा।

हो सकता है कुछ लोगों को ये अटपटा सा लगे। और वो सोचें कि जब अमेरिका और यूरोप का विकास हो रहा था तो उनपर कोई लगाम नहीं था। और अब जब हमारी बारी आई तो उत्सर्जन पर लगाम लगाने के लिए कार्बन क्रेडिट का लोभ दिया जा रहा है।

लेकिन ऐसा नहीं है। हमेशा अपनी लगती से ही सीख लेना अच्छी बात नहीं है। आज हमें दूसरों की गलती से सीख लेनी चाहिए। हम आज वो सबकुछ कर रहे हैं और करेंगे जो विकसित देशों ने कभी किया था। लेकिन उनसे बेहतर रूप में। हम वैसी अच्छी तकनीक का उपयोग करेंगे जो प्रदूषण कम फैलाएगा। हम जंगलों को बचाएंगे। ताकि विकसित होने के बाद हम जीत का जश्न मना सकें। क्योंकि विकसित देशों की नकल और अंध औद्योगिकीकरण के बल पर अगर हम आगे निकल भी गए तो तपती धरती पर हमारे अगले जेनरेशन को सर छुपाने की जगह नहीं मिलेगी।

शुक्रवार, 21 सितंबर 2007

विदेशी गेहूं और सरकारी घुन

सरकार को साढ़े आठ रु गेहूं बेचने से तो अच्छा है गाय को खिलाना। एक लीटर भी दूध ज्यादा हुआ तो डबल मुनाफा!


जब हम पिज्जा,बर्गर खा ही रहे हैं। विदेशी कपड़े और जूते पहन ही रहे हैं। तो विदेशी गेहूं से क्यों है परहेज? ये सवाल करोड़ों की है। क्योंकि सरकार ये गेहूं,पिज्जा-बर्गर खाने वाले और ब्रांडेड कपड़े पहनने वालों के लिए नहीं गरीब लोगों के लिए खरीद रही है। कह रही है फूड सिक्योरिटी उसका धर्म है। लेकिन सरकार अगर गरीबों को विदेशी गेहूं खिलाना ही चाहती है तो क्यों हो रहा है इसका विरोध। विपक्षी दलों के साथ ही सरकार की सहयोगी वामपंथी पार्टियों ने क्यों फूक दिया है विदेशी गेहूं और सरकार की इस पहल के खिलाफ बिगुल।

विरोध के एक-दो नहीं,कई कारण हैं। पहले तो सरकार घटिया,जानवरों को खिलाने वाला, घुन लगा हुआ गेहूं खरीदने वाली थी। लेकिन तेज विरोध के बाद उस टेंडर को रद्द करना पड़ा। फिर सरकार ने अपना रुख महंगे गेहूं की ओर कर दिया। और अब 16 रुपए प्रति किलो पर गेहूं खरीदने के लिए अमादा है। जबकि देश में इसबार गेहूं की बम्पर पैदाबार हुई है। यानी करीब 7 करोड़ 50 लाख टन जो कि पिछले साल के मुकाबले 3.1 परसेंट ज्यादा है। और अगर CMIE यानी सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडिया इकॉनोमी की मानें तो अगले कारोबारी साल में इस साल के मुकाबले 4.1 परसेंट ज्यादा पैदाबार की उम्मीद है।

कृषि मंत्री कहते हैं कि विदेशों में गेहूं की इसबार कम पैदाबार हुई है। और हमारे देश की तरह ही कई देश गेहूं के एक्सपोर्ट पर पाबंदी लगा चुके है या लगाने को तैयार हैं। लेकिन इससे डर कर क्या हमें MSP यानी मिनिमम सपोर्ट प्राइस(8.50 रु/किलो) से करीब 88 परसेंट ऊंची कीमत (16 रु/किलो) पर गेहूं खरीद लेना चाहिए?! बिल्कुल नहीं, क्योंकि जो करोड़ों रुपए हम विदेशी कंपनियों को दे रहे हैं जरूरत पड़ने पर उसकी एक चौथाई से भी कम रकम पर हम गेहूं की खरीदारी कर सकते हैं। बहरहाल इसकी जरूरत ही नहीं होगी। क्योंकि साढ़े सात करोड़ टन की उपज में से केवल 6 करोड़ 20 लाख टन गेहूं से ही देश का पेट भर जाएगा। और अगर नहीं भरेगा तो सरकार कुछ पैसे खर्च कर कालाबाजारी के लिए गोदाम में पड़ी गेहूं को निकलबा सकती है।

क्योंकि कालाबाजारी कराने में भी तो सरकार का ही हाथ होता है। अगर सरकार इसका ढ़िढोरा नहीं पीटे की इस साल कितने लाख टन गेहूं आयात करेगी, तो गेहूं की कालाबाजारी की जुर्रत कोई नहीं करेगा। सरकार को किसी भी इमर्जेंसी के लिए 40 लाख गेहूं बफर स्टॉक में रखना होता है। इसे चाहती तो सरकार भारतीय किसानों से खरीद सकती थी। लेकिन नहीं खरीद पायी। क्योंकि किसानों को पैसे देने में उसके हाथ कांपने लगे। और बड़ी मुश्किल से किसानों को 7.5 रुपए से कुछ आगे बढ़कर 8.5 रुपए प्रति किलो का भाव दे पायी। और इस भाव पर 1 करोड़ 10 लाख टन गेहूं खरीद सकी। या कह सकते हैं कि जानबूझकर खरीदी। ताकि बाद में इंपोर्ट के लिए कुछ स्पेस बना रहे।

बेटे,इसबार कुछ दिन और देशी गेहूं से ही काम चलाना होगा। लगता है सरकार विदेशी बाजारों में भाव और चढ़ने के इंतजार में है।

मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि प्राइवेट खरदारों को देश में मनभर गेहूं खरीदने में कोई दिक्कत नहीं आई। और वो भी एमएसपी के आसपास के भाव पर ही और अच्छी क्वालिटी की गेहूं।

राशन की दुकानों के जरिए गरीबों को देने के लिए भी सरकार के पास पर्याप्त गेहूं है। लेकिन इमर्जेंसी के लिए सरकार विदेशों से 5 लाख 11 हजार टन गेहूं 325 डॉलर प्रति टन के भाव से खरीद चुकी है। जबकि भारतीय किसानों को उसने 200 डॉलर प्रति टन का ही भाव दिए हैं। यही नहीं अंतरराष्ट्रीय बाजार में भाव और ऊपर जाने के बाद सरकार अब 8 लाख टन गेहूं 390 डॉलर प्रति टन के भाव से खरीदने वाली है। पर इससे कम में जब विदेशी बाजारों में गेहूं मिल रहे थे तो कई बार सरकार ने टेंडर कैंसिल कर दिए। पता नहीं शायद भाव बढ़ने का इंतजार कर रही होगी सरकार!

भ्रष्टाचार की घुन जब बोफोर्स और दूसरे आर्म्स डील में लग सकती है। तो गेहूं तो उसके लिए काफी उपयुक्त है। पिछले साल भी सरकार पर गेहूं के आयात में दलाली खाने का आरोप लगा था। जब एक पुराने मामले में ये बात सामने आई थी कि ऑस्ट्रेलिया से उसने 142.5 डॉलर प्रति टन के हिसाब से वही गेहूं खरीदा था जो मिश्र को 135 डॉलर प्रति टन को बेचा गया था। इस मामले में ऑस्ट्रेलियन कंपनी AWB ने किसी को 25 लाख डॉलर का दलाली दी थी।

शरद पवार महंगे गेहूं की खरीद के जितने भी तर्क दे रहे हैं। सभी बिना सिर पैर के हैं। शुक्र है कि उन्होंने ये नहीं कहा कि हमारा देश युवाओं का है और युवा जब रोटी खाते हैं तो गिनते नहीं!

सोमवार, 17 सितंबर 2007

रिको ऑटो में मुनाफे की सवारी



कंपनी - रिको ऑटो। सेक्टर - ऑटो पार्ट्स। एक साल का उच्चतम स्तर, 82 रुपए 90 पैसे। एक साल का न्यूतम स्तर 32 रुपए 45 पैसे। आज कीमत 36 रुपए 15 पैसे। यानी आपके पोर्टफोलियो के लिए द मोस्ट वांटेड स्टॉक। रिको ऑटो, देशी और विदेशी ऑटो कंपनियों को इंजन, ट्रांसमिशन, ब्रेकिंग और सस्पेंशन से जुड़े पार्ट्स सप्लाई करती है।

अगर इस कंपनी की ग्रोथ स्टोरी पर नजर डालें तो पता चलता है कि इसकी बिक्री केवल 6 वर्षों में पांच गुना से ज्यादा बढ़ी है। 1999 में बिक्री 3 करोड़ 40 लाख डॉलर थी जो कि 2005 में बढ़कर 15 करोड़ 70 लाख डॉलर पर पहुंच गई। वहीं मुनाफा 14 लाख डॉलर से बढ़कर 81 लाख डॉलर पर पहुंच गया।

रिको ऑटो का सबसे बड़ा कस्टमर हीरो होंडा है। जो कि देश में सबसे ज्यादा टू व्हीलर्स बेचती है। कंपनी कार और कमर्शियल वाहनों के लिए भी पार्ट्स सप्लाई करती है। अमेरिका और यूरोप में कंपनी की अच्छी पहुंच है।

एक समय था जब कंपनी की 60 परसेंट से ज्यादा की कमाई हीरो होंडा से होती थी। और जब हीरो होंडा कि बिक्री कम होती थी तो उसका असर कंपनी पर दिखने लगता था। इससे निजात पाने के लिए कंपनी ने अपना दरवाजा दूसरी कंपनियों के लिए भी खोल दी। आज टू व्हीलर सेग्मेंट में कंपनी की कस्टमर लिस्ट में बजाज, होंडा और सुजुकी का नाम भी शामिल है। यानी अब हीरो होंडा बिके या बजाज पल्सर फयादा रिको ऑटो को जरूर होगा।

पैसेंजर कार सेग्मेंट में कंपनी,मारुति सुजुकी,फोर्ड,जनरल मोटर्स,निसान,वोल्वो जगुआर, टाटा और लैंड रोवर को ऑटो पार्ट्स की सप्लाई करती है। वहीं कमर्शियल गाड़ी बनाने वाली कैटरपिलर्स,पर्किन्स जैसी कई बड़ी कंपनियों के नाम रिको ऑटो के कस्टमर लिस्ट में शामिल है।

इतना सब कुछ होते हुए भी कंपनी के शेयर पिछले कुछ दिनों में धाराशायी हो गए। जिसकी मुख्य वजह है रुपए का मजबूत होना। क्योंकि कंपनी के ज्यादातर ऑर्डर पुराने थे। साथ ही कंपनी पर ब्याज दर की भी मार पड़ी। ब्याज दर बढ़ने से गाड़ियों की बिक्री कम हुई। जिसका असर रिको ऑटो पर पड़ा।

लेकिन अब स्थिति बदल रही है। कंपनी अपना ध्यान यूरोपीय बाजारों पर बढ़ा रही है। ताकि डॉलर की मजबूती की मार से बचा जा सके। साथ ही देश में फेस्टिवल सीजन शुरू हो चुका है जिससे की गाड़ियों की बिक्री में तेजी आने का आनुमान है। कंपनी ने इसी साल दो ज्वाइंट वेंचर किए हैं। पहला ज्वांट वेंचर हाइड्रोलिक ब्रेक बनाने के लिए कांटिनेंटल ऑटोमोटिव सिस्टम के साथ तो दूसरा दोपहिया वाहनों के अल्यूमीनियम एलॉय व्हील बनाने के लिए जिनफेई चाइना के साथ।

रुपया अगर 2009 तक एक डॉलर के मुकाबले 32 रुपए पर भी पहुंच जाए। ऐसा कई अंतरराष्ट्रीय रिसर्च फर्म और बैंकों का मानना है। फिर भी रिको ऑटो को गम नहीं है। क्योंकि इस कंपनी में सस्ते ऑटो पार्ट्स बनाने की क्षमता है। और आने वाले दिनों में सस्ती कार (जो भी हो एक लाख या सवा लाख वाली) की जो आंधी देश में चलेगी। उसमें इस कंपनी की अहम भागीदारी होगी।


डिस्क्लेमर: रिको ऑटो के कुछ शेयर मैं भी होल्ड करता हूं।

रविवार, 2 सितंबर 2007

एनर्जेटिक है पावर ग्रिड कॉर्पोरेशन का IPO


भारत की सबसे बड़ी पावर ट्रांसमिशन कंपनी पॉवर ग्रिड कॉर्पोरेशन(पीजीसी) बाजार में उतरने को तैयार है। इसका आईपीओ 10 सितंबर को खुलेगा और 13 सितंबर को बंद होगा। निवेशकों के लिए प्राइमरी मार्केट में निवेश का ये सुनहरा अवसर है। क्योंकि भारतीय ट्रांसमिशन कारोबार में इस सरकारी कंपनी का एकाधिकार है। देश में बनाई जाने वाली कुल बिजली के एक तिहाई हिस्से का ट्रांसमिशन पीजीसी के जरिए ही होता है।

क्वालिटी के लिए आईएसओ 9001 से सम्मानित पावर ग्रिड कॉर्पोरेशन का दायरा 61875 हजार सर्किट किलोमीटर तक फैला है। जिसकी वजह से ये दुनिया के 6 सबसे बड़े पावर ट्रांसमिशन कंपनियों में शामिल है। एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र एक राज्य से दूसरे राज्य तक बिजली पहुंचाने वाली ये कंपनी आईपीओ से जुटाई गई 2984 करोड़ रुपए को 15 नए ट्रांसमिशन प्रोजेक्ट में लगाएगी।

कंपनी अपनी करीब 14 परसेंट शेयरों के लिए आईपीओ ला रही है। आईपीओ में 10 रुपए की फेस वैल्यू वाले प्रति शेयर के लिए 44 से 52 रुपए का प्राइस बैंड तय किया है। जो कि इस मिनी रत्न कंपनी के लिए काफी लुभावना लग रहा है।

ट्रांसमिशन कारोबार के लिए कंपनी ने टाटा पावर, जेपी ग्रुप, टोरेंट पावर जैसे कई कंपनियों के साथ ज्वाइंट वेंचर भी किया है। या यों कहें कि इन छोटे-छोटे ज्वाइंट वेंचर के जरिए पीजीसी प्राइवेट कंपनियों को ट्रांसमिशन का कारोबार सिखा रही हैं।

विकासशील से विकसित होने के लिए विश्व में पावरफुल स्थान पाने के लिए देश में पावर का होना काफी जरूरी है। जिसका फिलहाल काफी आभाव है। और ये बात सरकार भी मानती है। तभी तो वामपंथी साथियों के तमाम उपद्रव और विरोधों के बावजूद भारत-अमेरिका परमाणु समझौता लागू कराने पर अड़ी है। अगर ये समझौता होता है तो इसकी बिजली साथ ही आने वाली तमाम अल्ट्रा मेगा पावर प्रोजेक्ट की बिजली को ढ़ोने का काम पावर ग्रिड कॉर्पोरेशन को ही मिलने वाला है। यानी पावर भले ही हवा से बने, परमाणु से बने या सूर्य की रोशनी से, उसको एक राज्य से दूसरे राज्य तक पहुंचाने का ज्यादातर जिम्मा इसी कंपनी को मिलेगा।

पीजीसी अपना विस्तार टेलीकॉम और कंसल्टेंसी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर करने का मन बना चुकी है। फिलहाल इन दो क्षेत्रों का रेवेन्यू कंपनी के कुल रेवेन्यू का 2 और 2.6 परसेंट है। यानी भले ही ग्रिड फेल होने से कुछ समय के लिए बिजली चली जाए या ट्रांसमिशन और वितरण में कुल उत्पादन का करीब 40 परसेंट बिजली गुल हो जाए पीजीसी में निवेश से होने वाले फायदे की चमक हमेशा आपके लिए यादगार रहेगी।

रविवार, 19 अगस्त 2007

भारत के लिए कितना प्राइम है यूएस सबप्राइम ?


अमरीकी सबप्राइम क्राइसिस ने पूरी दुनिया के बाजारों को हिला कर रख दिया। भारतीय बाजार भी इसकी चपेट में आने से नहीं बच पाए। लेकिन भारतीय बाजार में अब तक जो गिराबट आई है, पैनिक सेलिंग उसके लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार है। हालांकि इसको समझने के लिए इस क्राइसिस को समझना ज्यादा जरूरी है।

अमेरीकी सबप्राइम लोन को निंजा लोन भी कहते हैं। निंजा फाइटर जिसतरह से अपनी आखों पर पट्टी बांधकर भी अपने दुश्मनों को परास्त कर देते हैं। उसी तरह से अमरीका के सैकड़ों छोटी-बड़ी फाइनेंशियल कंपनियां जिसे सबप्राइम मोर्टगेज कहते हैं। अपनी आंखों पर पट्टी बांधकर लोन बांटती है। वो लोन देते समय ये नहीं देखती है कि लोन लेने वाले का बैकग्राउंड क्या है और वो पैसे चुका पाएंगे भी या नहीं। बस उसे लोन दे देती है। केवल एक शर्त होता है उंचा इंटेरेस्ट रेट। जो किसी भी बैंक के इंटेरेस्ट रेट से कई गुणा ज्यादा होता है।

लेकिन अमरीकी बाजार में हाउसिंग का बुलबुला फूटते ही यूएस सबप्राइम के होश उड़ गए। रातों- रात सैकड़ों यूएस सबप्राइम मोर्टगेज दीवालिया हो गए। क्योंकि निंजा लोन लेने वालों ने हाथ खड़े कर दिए और इंटेरेस्ट देना बंद कर दिया। यानी निंजा लोन देने वालों ने जब आंखों से पट्टी हटाई तो सामने खाई दिखाई देने लगी।

यूएस सबप्राइम क्राइसिस के सामने आते ही पूरी दुनिया के बाजारों पर जैसे बिजली गिर पड़ी। सभी बाजार हफ्तों तक लुढ़कते रहे। और आगे भी इसका असर दुनिया भर के बाजारों पर देखने को मिलेगा। लेकिन इसका सबसे ज्यादा असर अमरीकी और यूरोपीयन मार्केट पर देखने को मिल सकता है। जिसका फायादा भारत जैसे इमर्जिंग मार्केट को होगा।

ये तो दुनिया का रिवाज है जहां ज्यादा कमाई होती है वहां डेवलप कंट्री पहले पहुंचते हैं। ये कई रूप में पहुंचते हैं। डायरेक्ट बैंक के जरिए या किसी फाइनेंशियल संस्थान के रूप में या हेज फंड के रूप में या किसी और रूप में। यूएस सबप्राइम मार्केट में अंधाधुंध कमाई हो रही थी। मोटे इंटेरेस्ट रेट के चक्कर में फ्रांस, जर्मनी, जापान, ब्रिटेन के कई संस्थानों सहित दुनियाभर के हेज फंडों ने अपने-अपने पैसे लगा रखे थे। और जब सबप्राइम का बुलबुला फूटा तो इन संस्थानों ने पैसे की कमी दूर करने के लिए दुनियाभर के शेयर बाजारों से पैसे निकालने शुरू कर दिए। जिससे बाजारों में गिरावट शुरू हो गई। यूरोपियन सेंट्रल बैंक को तो अपने यहां पैसे की कमी को दूर करने के लिए एक दिन में 130 अरब डॉलर बाजार में छोड़ना पड़ा। ईसीबी ने अबतक एक दिन में इतने पैसे बाजार में पहले कभी नहीं छोड़े थे। 9/11 की घटना के बाद आयी मंदी में भी नहीं। फ्रांस की सबसे बड़ी बैंक बीएनपी पारिबा ने भी तीन इन्वेस्टमेंट फंड को करीब 4 अरब डॉलर निकालने से रोक दिया। यानी उनके एकाउंट फ्रीज कर दिए। अमेरिका ने भी बाजार में काफी पैसे इंजेक्ट किए। साथ ही अमरीकी सेंट्रल बैंक को लिक्विडिटी बनाए रखने के लिए ब्याज दरों में आधे परसेंट की कटौती करने के लिए बाध्य होना पड़ा।

भारतीय बाजार भी इस अंधर में कुछ हद तक हिला। लेकिन अपना फाउंडेशन कमजोर होने की वजह से नहीं बल्कि निगेटिव सेंटिमेंट और पैनिक सेलिंग की वजह से। पैनिक सेलिंग करने वालों में ज्यादातर ऊपर वाले और एकदम नीचे वाले हैं। यानी एफआईआई, हेज फंड और छोटे निवेशक। जो कि जल्द ही भारतीय बाजार में लौट आएंगे। क्योंकि इन एफआईआई और हेज फंडों ने जिनके पैसे गंवाए हैं। कुछ हदतक तो उसकी भरपाई भारत सहित दूसरे देशों के बाजारों से पैसे निकाल कर पूरी कर पाएंगे। लेकिन पूरी तरह उसकी भरपाई अब तभी कर पाएंगे जब भारतीय और कुछ इमर्जिंग बाजारों में वो लंबे अवधि के लिए बने रहेंगे। क्योंकि इन फंडों को जितना नुकसान हुआ है उसकी भरपाई अब केवल इमर्जिंग मार्केट ही कर सकता है ना कि कोई विकसित बाजार।

सोमवार, 2 जुलाई 2007

भारतीय सेज: कांटों या फूलों का ?


SEZ (सेज) यानी स्पेशल इकॉनोमिक ज़ोन की आंधी आजकल देश में चल रही है। केंद्र और राज्य सरकारें (चाहे किसी भी दल की हों) इस आंधी को चीनी चश्मे से देख रहे हैं। इसलिए उन्हें इसमें सुख, समृद्धि की ताकत दिख रही है। और शायद यही वजह है कि लेफ्ट भी इस आंधी में राइट का रूख पकड़ चुका है।


जबकि सच्चाई कुछ और है। दुनियाभर के करीब 3000 एसईजेड में शायद ही कोई ऐसा है जो चीन के कुल पांच में से किसी एक एसईजेड की बराबरी कर पाए। रूस सहित दुनिया के कई एसईजेड फ्लॉप सबित हुए हैं। क्योंकि चीन की हर बात की नकल नहीं की जा सकती। सस्ता लेबर, ज्यादा मेहनती लोग, कोस्टल एरिया, सरकार की मजबूत पकड़, सब्सिडी आदि चीन के एसईजेड के सफल होने के मूलमंत्र हैं।


अगर चीन के एसईजेड में एक आदमी हर घंटे 10 पंखे की वायरिंग करता है। और दिन का मेहनताना केवल 200 रु लेता है। तो इसमें उसके एसईजेड मॉडेल का क्या हाथ है ? ये तो वहां के लोगों की अच्छी प्रोडक्टिविटी है। एसईएज का फायदा तो केवल ये है कि वो पंखे कुछ ही क्षणों में बहुत कम ढ़ुलाई खर्च पर एक्सपोर्ट के लिए जहाज पर पहुंच जाता है। क्या ऐसा भारत में हो पाएगा। शायद नहीं, क्योंकि यहां का इंफ्रास्ट्रक्चर चीन से मीलों पीछे है। लोगों की उत्पादकता भी उतनी नहीं है। कच्चे माल महंगे हैं, बिजली महंगी है, ढ़ुलाई खर्च ज्यादा है। एसईजेड बनने के बाद भी इसमें ज्यादा बदलाव होता नहीं दिख रहा है। क्योंकि एसईजेड का बंदरबांट हो रहा है। उत्तरांचल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, गुड़गांव, पुणे में बनने वाले ऑटो फैक्ट्रियों को सरकार अगर किसी एक ही एसईजेड या किसी एक ही शहर के एसईजेड में ला पाती। तो इसका फायदा जरूर ऑटो कंपनियों और इससे जुड़े एसएमई सहित देश को होता। लेकिन दुर्भाग्य ये है कि सरकार की ऐसी कोई नीति नहीं है।


सरकार तो बस कुकुरमुत्ते की तरह एसईजेड खोलने में लगी है। अगर सरकार किसी एक सेक्टर का एसईजेड किसी एक एरिया में बनाती है तो उसके दूरगामी अच्छे परिणाम होंगे। और उसके बाद भले ही हमारे उत्पाद चीन से कीमतों में कुछ ज्यादा महंगे होंगे लेकिन क्वालिटी के मामले में हम भारी पड़ सकते हैं। लेकिन क्वालिटी का फायदा हमें तभी मिलेगा जब दोनों देशों के उत्पादों के बीच कीमतों की खाई कुछ कम हो।


एसईजेड का कानून जिसे हम एसईजेड एक्ट 2005 के नाम से जानते हैं। इसे 10 फरबरी 2006 को लागू किया गया। इसके तहत 22 जून 2007 तक कुल 127 एसईजेड को काम शुरू करने की फाइनल इजाजत दे दी गई । यानी बोर्ड ऑफ एप्रूवल ने इसे नॉटिफाइ कर दिया। इस कानून के तहत सबसे पहले देबी लेबोरेटरीज को करीब 105 हेक्टेयर पर फार्मास्युटिकल एसईजेड बनाने की इजाजत दी गई। इस कानून के तहत बने 63 एसईजेड में काम भी शुरू हो चुका है। जिसमें करीब साढ़े 18 हजार लोगों को रोजगार मिला है। इन 63 एसईजेड को बनाने में कंपनियों ने साढ़े 13 हजार करोड़ रु का निवेश किया है। इस कानून के बनने से पहले देश में 19 छोटे-छोटे एसईजेड काम कर रहे थे। जिसके एक्सपोर्ट ग्रोथ में 2003 से 2006 के बीच 15 परसेंट की गिरावट आई है। इसके बावजूद सरकार सामान्य ढर्रे पर चलने से बाज नहीं आना चाहती।


किसानों और विस्थापितों के पुनर्वास की समुचित व्यवस्था करने के लिए सरकार ने कुछ समय के लिए SEZ के बंदरबांट को रोक लिया था। और उस दौरान SEZ कानून में दूसरा सुधार कर डाला। यानी अब कोई भी एसईजेड 5 हजार हेक्टेयर से बड़ा नहीं होगा। और किसानों से अब जमीन कंपनियां खुद खरीदेंगी। लेकिन इसमें विस्थापितों के पुनर्वास की समुचित व्यवस्था की कोई झलक नहीं मिलती। अब अगर 25 एकड़ में एसईजेड बने या 5 हजार हेक्टेयर में लोग तो विस्थापित होंगे ही। क्योंकि सारे एसईजेड शहर के आसपास ही बन रहे हैं। विस्थापितों की समस्यायों को दूर किए बगैर ही सरकार फिर से नारा लगाने लगी है एसईजेड ले लो, एसईजेड ले लो!


सरकार ने कुल 234 एसईजेड के जरिए 3 लाख करोड़ रु के निवेश और 40 लाख नौकरियों का लक्ष्य रखा है। पर ये दूर का ढ़ोल ही लगता है। क्योंकि एफडीआई खींचने की महत्वाकांक्षा के बावजूद ज्यादातर एसईजेड में देश की कंपनियों का ही पैसा लग रहा है। और अबतक पास हुए कुल एसईएज का करीब 70 परसेंट आईटी और आईटीईएस से ही संबंधित है। इसकी एक वजह है। इनकी टैक्स हॉलिडे 2009 में खत्म हो रहे हैं। इसलिए ये कंपनियां 15 साल के दूसरे टैक्स हॉलिडे (एसईजेड पर) में शिफ्ट कर रही हैं। वित्त मंत्रालय और वाणिज्य मंत्रालय के बीच तनातनी की एक मुख्य वजह ये भी है। और हो भी क्यों नहीं वित्त मंत्रालय या यों कहें कि देश के राजस्व को एसईजेड में लगने वाले हर एक रुपए पर एक रुपए साठ पैसे का नुकसान हो रहा है। आरबीआई ने भी एसईजेड को रियल्टी से अलग दर्जा देने से मना कर दिया है।


अगर अब भी सरकार एसईजेड की पॉलिसी में आधारभूत बदलाव नहीं करती है। तो देश के सैकड़ों एकड़ उपजाऊ जमीन एसईजेड की भेंट चढ़ जाएंगे। बिहार जैसे बीमारू राज्य विकासशील भी नहीं बन पाएंगे। अमीर राज्य और अमीर होते जाएंगे। विस्थापितों की फौज जमा हो जाएगी। और एसईजेड कुछ लोगों और कंपनियों के लिए एक SPECIAL ENJOYMENT ZONE बनकर रह जाएगा।