शनिवार, 8 अगस्त 2009

महंगाई की मार सरकार लाचार

दाल की कीमतें पिछले साल के मुकाबले दोगुना हो चुकी हैं। वहीं चावल की कीमतों में तेजी की शुरूआत हो चुकी है। तेल की कीमतें भी पिछले साल के मुकाबले ऊपर ही चढ़ती जा रही हैं। पिछले साल अरहर दाल प्रति किलो मिल रही थी 48 रुपए में जो इस साल बढ़कर 86 रुपए पर पहुंच चुकी है। मूंग दाल 48 रुपए प्रति किलो से बढ़कर 74 रुपए प्रति किलो पर जा पहुंची है। मूंग साबूत पिछले साल 50 रुपए प्रति किलो मिल रही थी। जो इस इस 70 रुपए प्रति किलो पर पहुंच चुकी है। काला मसूर भी एक साल में 48 रुपए से 70 रुपए पर पहुंच चुकी है। वहीं उड़द साबूत पिछले साल 48 रुपए प्रति किलो मिल रही थी। जो इस साल 68 रुपए प्रति किलो पर पहुंच चुकी है। परमल राइस की कीमत पिछले साल 17 रुपए प्रति किलो थी। जो इस साल बढ़कर 20 रुपए पर पहुंच चुकी है। चीनी 22 रुपए प्रति किलो से बढ़कर 29 रुपए प्रति किलो पर जा पहुंची है। महंगाई से फिलहाल लोगों को निजात नहीं मिलने वाली है। ऐसा मानना है प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का। क्योंकि इसबार कम मॉनसून की वजह से खरीफ फसलों की बुआई कम हो पायी है। जिसका असर आने वाले दिनों में खाने पीने के सामानों की कीमतों पर देखी जा सकती है। मनमोहन सिंह महंगाई के मुद्दे पर राज्य के मुख्य सचिवों के साथ मीटिंग के बाद ये बात कही। प्रधानमंत्री ने कहा कि राज्यों को अपनी ओर से भी इस मुद्दे से निपटना चाहिए। कालाबाजारी और जमाखोरी को रोका जाना चाहिए। साथ ही प्रधानमंत्री ने मॉनसून की कमी को कुछ हद तक पूरा करने के लिए सूखा प्रभावित जिलों के किसानों  को केंद्र की ओर से डीजल पर 50 फीसदी सब्सिडी देने का ऐलान किया है। इसके साथ ही मनमोहन सिंह ने कही कि सूखे से प्रभावित राज्यों को सेंट्रल पूल से बिजली दी जाएगी। इस तरह की सहायता के ऐलान के बावजूद प्रधानमंत्री के संकेतों से साफ है कि महंगाई की समस्या आने वाले दिनों में और विकराल रुप ले सकती है। अभी तो दाल, चीनी, सब्जियों की कीमतें ही रुला रही हैं। लेकिन आने वाले दिनों में इस लिस्ट में चावल-मक्का जैसे कई और खाने पीने के सामान जुड़ जाएंगे। क्योंकि इस बार खराब मॉनसून की वजह से खरीफ फसलों की जब बुआई ही कम हो पायी है तो फसल कैसे अच्छी हो सकती है। हालांकि प्रधानमंत्री ने कहा कि सरकार के पास अन्न के पर्याप्त भंडार हैं और देश में किसी को भूख से मरने नहीं दिया जाएगा। लेकिन किसानों में सुसाइड करने की शुरूआत कर दी है!

मॉनसून की बिजली किसानों पर

पहले से ही दाल-सब्जी की ऊंची कीमतों की मार से आम लोग बेहाल हैं। लेकिन आने वाले दिनों में भी उन्हें राहत मिलने के कोई आसार नहीं दिखाई दे रहे हैं। आने वाले दिनों में दाल की बढ़ती कीमतों का साथ चावल, तेल और चीनी भी महंगी होगी। क्योंकि पिछले साल के मुकाबले खरीफ फसलों की बुआई में भारी कमी आई है। जबकि खपत में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। 31 जुलाई 2008 तक धान की बुआई 256.76 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी। जबकि इस साल 31 जुलाई तक केवल 191.30 लाख हेक्टेयर में ही धान की बुआई हुई है। यानी कि आने वाले दिनों में थाली में चावल को शामिल करने के लिए आपको ज्यादा खर्च करने पड़ सकते हैं। यही हाल तिलहन का भी है। पिछले साल  144.66 लाख हेक्टेयर में तिलहन की बुआई की गई थी। जो कि इस साल फिसलकर 141.79 लाख हेक्टेयर पर पहुंच चुकी है। चीनी का स्वाद कड़वा हो सकता है। क्योकि आने वाले दिनों में चीनी के लिए आपको ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ सकते हैं। गन्ने की बुआई पिछले साल के 43.79 हेक्टेयर से फिसलकर इस साल  42.50 हेक्टेयर पर पहुंच चुकी है। इन आंकड़ों का असर फिलहाल आम लोगों को भले ही नहीं दिख रहा हो। लेकिन इसने सरकार की नींदें ज़रुर उड़ा दी है। और सरकार ने आनन फानन में सूखे से प्रभावित जिलों के किसानों के लिए डीजल पर मिलने वाली सब्सिडी को 30 सितंबर तक बढ़ा दिया है। ताकि किसान पानी की कमी को बोरिंग के जरिए पूरी कर सके। सूखे की सबसे ज्यादा मार उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड पर पड़ी है। जो सबसे ज्यादा चिंता का विषय है। क्योंकि इन राज्यों के ज्यादा से ज्यादा लोग कृषि पर निर्भर हैं।   उत्तर प्रदेश की मायावती सरकार ने कई जिलों को सूखा प्रभावित घोषित भी कर चुकी हैं। साथ ही बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार पूरे राज्य को सूखा ग्रसित घोषित करने वाले हैं। क्योंकि बिहार में केवल 17 फीसदी ही बुआई हो पायी है। सूखे का ऐसा की कुछ आलम उत्तर पूर्वी राज्य असान और मणिपुर का भी है। मौसम विभाग के अनुसार जुलाई महीने में देशभर में सामान्य से 18 फीसदी कम बारिश हुई है। जबकि इस साल जून में पिछले 83 सालों में सबसे कम बारिश हुई है। जिसका सीधा असर दाल, ज्वार, बाजार, मक्का और चावल जैसे खरीफ फसलों पर देखी जाएगी। क्योंकि खरीब फसलों की बुआई जून-जुलाई में ही की जाती है। यानी आने वाले दिनों में किचन का बजट लोगों को काफी परेशान कर सकता है।  

बुधवार, 5 अगस्त 2009

ब्लैकबेरी का चल गया जादू

ब्लैकबेरी का काला जादू ना केवल भारत में बल्कि दुनियाभर में सर चढ़कर बोल रहा है। ये वही फोन है जिसका इस्तेमाल दुनिया के सबसे ताकतवर आदमी यानी अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा भी करते हैं। और वही ब्रांड आप भी मात्र 14000 रुपए में खरीद सकते हैं। हालांकि ओबामा के मोबाइल को कंपनी ने स्पेशल तौर पे तैयार किया है। दुनियाभर में ब्लैकबेरी की बिक्री दिन ब दिन बढ़ती ही जा रही है। ब्लैकबेरी ने मोबाइल बनाने वाली दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी नोकिया के होश उड़ा दिए हैं। 2007 की चौथी तिमाही के मुकाबले 2008 की चौथी तिमाही में करीब 85 फसदी ज्यादा ब्लैकबेरी फोन बिके हैं। ब्लैकबेरी फोन कनाडा की एक कंपनी रिसर्च इन मोशन यानी रिम बनाती है। वहीं नोकिया की बिक्री में इस दौरान करीब 17 फीसदी की कमी आई है। दुनियाभर में मोबाइल की बिक्री चौथी तिमाही07 ब्लैकबेरी(रिम) 40,24,000 नोकिया 1,87,03000 चौथी तिमाही08 ब्लैकबेरी(रिम) 74,42,000 नोकिया 1,55,61000 फिनलैंड की कंपनी नोकिया मोबाइल बनाने वाली दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी है। और दुनिया के कुल मोबाइल बाजार के 40 फीसदी से ज्यादा हिस्से पर अभी भी नोकिया का ही कब्जा है। और ब्लैकबेरी का मार्केट शेयर है करीब 10 फीसदी। हालांकि जिस गति से नोकिया की बिक्री कम हो रही है। और ब्लैकबेरी सहित दूसरे मोबाइल फोन्स की बिक्री बढ़ रही है। उसे देखकर लगता है कि आने वाले दिनों में नोकिया को अपनी बादशाहत कायम रखने के लिए काफी मेहनत करनी होगी।

लक्ष्मी मित्तल का घर किराए पर !

स्टील किंग और दुनिया के सबसे रईस लोगों में से एक लक्ष्मी मित्तल का लंदन स्थित घर 'समर पैलेस' किराए के लिए खाली है। लेकिन इसे रेंट पर हर कोई नहीं ले सकता। क्योंकि इस घर के लिए हर हफ्ते करीब 8 लाख रुपए किराए के तौर पर देना होगा। यानी महीने में 32 लाख रुपए। लक्ष्मी मित्तल का ये महलनुमा घर उत्तरी लंदन के हैंपस्टेड में है। समर पैलेस को लक्ष्मी मित्तल ने 1996 में खरीदा था। समर पैलेस पूरे एक एकड़ में फैला है। लंदन के पॉश इलाके में बने इस घर में 11 बेडरूम  और 12 बाथरूम है। इसके साथ ही ये घर जकूजी, स्टीम रूम जैसे कई सुविधाओं से लैश है। ग्लास लिफ्ट और स्विमिंग पूल इस घर की सुंदरता को और बढ़ा देता है।  13 साल पहले मित्तल ने इस लग्जरी समर पैलेस को लगभग 56 करोड़ रुपए में खरीदा था। लेकिन अब लक्ष्मी मित्तल अपने परिवार के साथ पश्चिमी लंदन के केनिंग्स्टन स्थित 15 बेडरूम के बंगले में शिफ्ट कर गए हैं। जो मित्तल ने फार्मूला वन के चैंपियन ड्राइवर बेर्ने एकलिस्टन से 400 करोड़ से कुछ अधिक की रिकॉर्ड कीमत में खरीदा था। पिछले साल की आर्थिक मंदी और जरूरत न होने के कारण अब मित्तल अपना पुराना घर यानी समर पैलेस को बेचना चाहते हैं। लेकिन मित्तल को खरीदार नहीं मिल रहा है। क्योंकि उनकी डिमांड है करीब सवा तीन सौ करोड़ रुपए। यही वजह है कि अब उन्होंने अपने महल जैसे इस समर पैलेस को किराए पर देने का फैसला किया है।

आईफोन से लग सकता है बिजली का झटका !

दुनियाभर में धूम मचाने वाली आईफोन और आईपॉड एकबार फिर से चर्चा में है। लेकिन इस बार अपनी अच्छी तकनीक और अच्छी क्वालिटी के लिए नहीं बल्कि बिजली के झटके के लिए। जी हां...आईफोन और आईपॉड से इयरफोन के जरिए गाने सुनने के दौरान लग सकता है आपको बिजली का झटका है। एप्पल ने अपनी वेबसाइट पर इस बात को स्वीकार किया है। एप्पल ने माना है कि ड्राई एयर वाले इलाके में आईफोन और आईपॉड से ईयरफोन के जरिए गाना सुनने पर आपको बिजली के हल्के झटके लग सकते हैं। ये झटके इयरफोन के इयर बड्स से लग सकते हैं। ये हल्के झटके इलेक्ट्रोस्टेटिक डिस्चार्ज की वजह से लगते हैं। कंपनी ने आईफोन और आईपॉड यूज करने वाले लोगों को हिदायत दी है कि ड्राई एयर वाले इलाके में वे इयरफोन लगाने के बदले स्पीकर ऑन कर गाने सुनें। साथ ही गाना सुनने के दौरान वैसे मेटल को ना छुएं जिसपर पेंट नहीं चढ़ा हो। इसके साथ ही एप्पल ने कहा है कि ऐसा नहीं है कि केवल एप्पल के प्रोडक्ट में ही ये झटके लगते हैं। किसी भी हार्डवेयर में इस तरह के इलेक्ट्रोस्टेटिक डिस्चार्ज की वजह से झटके लग सकते हैं। आईपॉड एप्पल का हाई एंड म्यूजिक प्लेयर है तो आईफोन कंपनी की हाई एंड फीचर्स वली टच स्क्रीन फोन है। इन दोनों गैजेट्स ने लांच के समय से ही दुनियाभर में तहलका मचा रखा है। दुनियाभर में लोग इसे खूब पसंद करते हैं। लेकिन झटके की खबर के बाद इसकी लोकप्रियता में कुछ कमी जरूर आ सकती है।

बुधवार, 3 जून 2009

जनरल मोटर्स हुई दिवालिया

अमेरिका की शान समझी जाने वाली पिछले साल तक कार बनाने वाली दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी जनरल मोटर्स का निकल गया दिवालिया। करीब 100 सालों तक अमेरिका का झंडा बुलंद करने वाली इस कंपनी ने कर्ज के तले दम तोड़ दिया। जीएम यानी जेनरल मोर्टस की दुनियाभर के कार बाजार में कभी तूती बोलती थी। इस कंपनी का एक स्वर्णिम इतिहास रहा है। आज से करीब 100 साल पहले 1908 में जनरल मोटर्स की नींव रखी गई। और केवल 23 साल में ही जनरल मोटर्स बन गई दुनियाभर में सबसे ज्यादा कार बेचने वाली कंपनी। और तब से लगातार 77 सालों तक इसने ग्लोबल कार बाजार पर अपनी बादशाहत बनाए रखी। लेकिन अमेरिकी मंदी ने जनरल मोटर्स की नींव हिला कर रख दी। मंदी की तूफान ने पहले सबसे ज्यादा कार बेचने का ताज जेनरल मोटर्स के सर से उड़ा दिया। 1931 से 2007 तक नंबर एक बने रहने के बाद 2008 में जेनरल मोटर्स के सर से दुनियाभर में सबसे ज्यादा कार बनाने का ताज जापानी कंपनी टोयोटा ने  छीन ली। और इसके ठीक एक साल बाद जनरल मोटर्स दिवालिया हो गई। इसके बाद अमेरिकी सरकार ने जीएम की स्टेयरिंग अपने हाथ में ले ली है। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने जीएम को फिर से पटरी पर लाने के लिए 60 अरब डॉलर खर्च करने का ऐलान किया है। लेकिन अब अगर जीएम रफ्तार पकड़ भी लेती है तो जापान और कोरिया के दिग्गज ऑटो कंपनियों को ओवरटेक करने में उसे काफी साल लग जाएंगे। फिलहाल तो जीएम से जुड़ी तमाम घाटे वाली कंपनियों और गाड़ियों को बेचने की तैयार में लग चुकी है अमेरिकी सरकार। जनरल मोटर्स करीब 34 देशों में अपनी कार और ट्रक बनाती है। जिसे करीब 140 देशों में बेचती है। जनरल मोटर्स ने दुनियाभर में करीब 2.5 लाख लोगों को रोजगार दे रखा है। लेकिन आज जेनरल मोटर्स की कुल संपत्ति से ज्यादा उसपर कर्ज बकाया है। जेनरल मोटर्स के पास फिलहाल 82 अरब डॉलर की संपत्ति है लेकिन कंपनी पर 172 अरब डॉलर का कर्ज बकाया है। अमेरिकी इतिहास में किसी कंपनी के दिवालिया होने की ये चौथी बड़ी घटना है। जेनरल मोटर्स के दिवालिया होने से अमेरिकी ऑटो इंडस्ट्री के एक युग का अंत हो गया है। 

ए राजा...टेक IT सीरियसली

ग्लोबल मंदी के इस माहौल में आईटी सेक्टर में चुनौतियां ही चुनौतियां हैं। क्योंकि ये एक ऐसा सेक्टर है जिसका ज्यादातर बिजनेस दुनिया के दूसरे देशों से जुड़ा हुआ है। इसलिए  भारत में सबकुछ ठीक भी हो जाने पर और अर्थव्यवस्था को पटरी पर आ जाने के बाद भी इस मंत्रालय के सामने चुनौतियों की कमी नहीं होगी। सबसे पहली और अहम चुनौती होगी।  अमेरिका के साथ बीपीओ बिजनेस को पटरी पर लाना। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने उन कंपनियों को टैक्स में छूट देने से मना कर दिया है जो अपना काम भारतीय कंपनियों से करवाती हैं। ऐसे में भारतीय बीपीओ इंडस्ट्री को काफी बड़ा झटका लगा है। अब जरूरत है लो कॉस्ट बिजनेस डिलेवरी मॉडल की। तभी टैक्स छूट नहीं लेकर भी अमेरिकी कंपनियां भारत में अपना काम आउटसोर्स कर पाएंगी। भारत के कुल आउटसोर्सिंग कारोबार का करीब 60 फीसदी हिस्सा अमेरिका के साथ जुड़ा है। इसके साथ ही भारतीय आईटी इंडस्ट्री को दुनियाभर में अपनी कॉरपोरेट गवर्नेंस की छवि में सुधार करना होगा। क्योंकि सत्यम घोटाले के बाद भारतीय आईटी इंडस्ट्री के कॉरपोरेट गवर्नेंस पर दुनियाभर में सवाल उठने लगे हैं। भारतीय आईट इंडस्ट्री को रुपए और डॉलर के खेल की वजह से बार बार झटका लगता है। डॉलर के मुकाबले रुपए के मजबूत होते ही आईटी इंडस्ट्री का बुरा हाल हो जाता है। कंपनियों के मार्जिन और प्रॉफिट में कमी हो जाती है। इसलिए कंपनियों को हेजिंग और अमेरिका पर से अपनी निर्भरता कुछ कम करनी होगी। साथ ही आईटी सेक्टर्स को ऐसे सॉल्यूशन तैयार करने होंगे जो कि इस समय के  दुनिया के कई अहम मुद्दों जैसे एनर्जी, सिक्योरिटी, क्लाइमेट चेंज में काम आ पाए। तभी आईटी इंडस्ट्री को अगले दौर में ले जाया जा सकेगा। देश में आईटी का विस्तार भी आईटी मंत्रालय के सामने एक चुनौती होगी। देश में गांव गांव तक आईटी के विस्तार के लिए आसान और सस्ती टेक्नोलॉजी पर काम करना होगा। नए आईटी मंत्री ए राजा को इन सभी बातों का ख्याल रखना होगा।  तभी भारतीय आईटी इंडस्ट्री की तूती दुनिया भर बोलती रहेगी। और अगर इसमें कहीं भी चूक होती है तो भारत को मिलने वाला कारोबार फिलिपिंस, नाइजीरिया और पूर्वी यूरोप देशों में शिफ्ट हो सकते हैं। लेकिन कौड़ियों के भाव टू जी स्पेक्ट्रम की निलामी कर सरकार को हजारों करोड़ का चूना लगाने वाले ए राज इन चुनौतियों का किस तरह से सामना करते हैं ये तो आने दिनों में ही पता चल पाएगा।