ब्रिक्स देशों को सम्मेलन में प्रधानमंत्री ने कहा कि मंदी से ब्रिक्स के सभी देश प्रभावित हैं। और इससे उबरने के लिए एक ब्रिक्स बैंक की बेहद ज़रूरत है। प्रधानमंत्री ने साफ कहा कि ब्रिक्स की मज़बूती में इस संगठन के जुड़े पांचों देशों को साझा फायदा है।
नई दिल्ली में चल रहे चौथे ब्रिक्स सम्मेलन में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सभी ब्रिक्स देशों से आपसी सहयोग बढ़ाने का आह्वान किया है।
- प्रधानमंत्री ने इस मौके पर बताया कि विश्व बैंक की तर्ज पर ब्रिक्स देशों की अगुवाई में एक डेवलपमेंट बैंक बनाने के प्रस्ताव पर विचार करने पर सहमति बन गई है।
-ब्रिक्स देशों की बैठक में भारत और चीन ने साफ कर दिया है कि वो ईरान पर प्रतिबंध नहीं लगाएंगे। और ईरान से तेल खरीदते रहेगें। चीन अपनी ज़रूरतों का करीब 20 फीसदी तेल ईरान से आयात करता है। जबकि भारत अपनी ज़रूरतों का करीब 12 फीसदी तेल ईरान से आयात करता है।
- ब्रिक्स देशों में आपस में लोकल करेंसी में व्यापार करने के महत्वपूर्ण करार पर आज दस्तखत किए गए। इस समझौते के तहत ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका में आपसी व्यापार के लिए लोकल करेंसी में कर्ज दिया जा सकेगा।
- इसके साथ ही ब्रिक्स देशों के सम्मेलन को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधारों के लिए ब्रिक्स देशों को मिलकर आवाज़ उठानी चाहिए।
- ब्रिक्स देशों ने 2015 तक आपस में 500 अरब डॉलर का व्यापार करने का लक्ष्य रखा है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि इस वक्त दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं के लिए कई चुनौतियां हैं, ऐसे में देशों को व्यापार बढ़ाने के लिए सहयोग बढ़ाना होगा। ब्रिक्स दुनिया के तेजी से विकास कर रहे देशों का संगठन है और इसमें भारत के अलावा ब्राजील, रुस, चीन और दक्षिण अफ्रीका शामिल हैं। ब्रिक्श देशों में दुनिया के करीब पचास फीसदी आवादी रहती है। लेकिन दुनिया के जीडीपी में ब्रिक्स देशों का 18.2 फीसदी का योगदान है। लेकिन इन देशों में बहुत तेजी से विकास हो रहा है। और ऐसा माना जा रहा है कि साल 2035 तक ब्रिक्स दुनिया का सबसे ताक़तबर संगठन बन जाएगा।
गुरुवार, 29 मार्च 2012
बुधवार, 28 मार्च 2012
कल से दिल्ली में ब्रिक्स देशों की बैठक
दुनिया के पांच सबसे तेजी से विकास करने वाले देशों के प्रमुखों की बैठक कल से दिल्ली में होने वाली है। ब्रिक्स देशों के इस सम्मेलन में कई अहम मुद्दों पर चर्चा होगी। जिसमें प्रमुख होगा मध्य पूर्व संकट और अमेरिकी डॉलर पर से निर्भरता कम करना।
दुनिया की ऊभरती हुई नई ताक़त यानी ब्रिक्स की कल से शुरू होने वाली बैठक में आपकी अर्थव्यवस्था के विकास पर चर्चा की जाएगी। इस बैठक में एक बैंक के गठन का ऐलान हो सकता है। जो ब्रिक्स देशों की सहायता करेगा। ब्रिक्स तेजी से विकास कर रहे पांच देशों ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका का एक संगठन है। भारत में पहली बार होने वाली इस बैठक में भारत सहित पांचों देशों के प्रमुख हिस्सा लेंगे। इस बैठक में ईरान समस्या पर भी चर्चा होगी। दरअसल ईरान से तेल नहीं खरीदने का अमेरिकी दबाव लागातर भारत और चीन पर बढ़ रहा है। और ऐसा नहीं करने पर अमेरिकी इन दोनों देशों पर कुछ आर्थिक प्रतिबंध लगाने पर विचार कर रहा है। लेकिन तेजी से विकास कर रहे भारत और चीन के पास ईंधन के लिए ईरान के बदले दूसरे विकल्प कम हैं। ऐसे में ब्रिक्स देश अमेरिकी डॉलर पर से अपनी निर्भरता धीरे-धीरे कम करना चाह रहे हैं। ताकि किसी तरह के अमरीकी प्रतिबंध का असर ब्रिक्स देशों पर ना हो। साथ ही पांचों देश मिलकर एक एक्सचेंज का गठन का ऐलान कर सकते हैं जिसमें पांचों देशों के सूचकांक लिस्टेड होंगे और पांचों देश के नागरिक अपनी-अपनी करेंसी में उसमें कारोबार कर पाएंगे।
दुनिया की करीब आधी आबादी इन पांच देशों में रहते हैं। इसलिए ये पांच देश एक बड़े बाजार के तौर पर पूरी दुनिया में देखे जाते हैं। यूरोप और अमेरिकी में आर्थिक अनिश्चितता का माहौल है। ऐसे में अमेरिका और यूरोपीय देश भी ब्रिक्स देशों पर अपनी टकटकी लगाए हुए है। अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भी कई बार कह चुके हैं कि दुनियाभर के देशों की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में भारत चीन और ब्राजील जैसे देशों की अमह भूमिका होगी। लेकिन ब्रिक्स देशों की खुद की अर्थव्यवस्था अब सुस्त होती दिख रही है। ऐसे में इन देशों को पहले खुद को संभालने की ज़रूरत है।
दुनिया की ऊभरती हुई नई ताक़त यानी ब्रिक्स की कल से शुरू होने वाली बैठक में आपकी अर्थव्यवस्था के विकास पर चर्चा की जाएगी। इस बैठक में एक बैंक के गठन का ऐलान हो सकता है। जो ब्रिक्स देशों की सहायता करेगा। ब्रिक्स तेजी से विकास कर रहे पांच देशों ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका का एक संगठन है। भारत में पहली बार होने वाली इस बैठक में भारत सहित पांचों देशों के प्रमुख हिस्सा लेंगे। इस बैठक में ईरान समस्या पर भी चर्चा होगी। दरअसल ईरान से तेल नहीं खरीदने का अमेरिकी दबाव लागातर भारत और चीन पर बढ़ रहा है। और ऐसा नहीं करने पर अमेरिकी इन दोनों देशों पर कुछ आर्थिक प्रतिबंध लगाने पर विचार कर रहा है। लेकिन तेजी से विकास कर रहे भारत और चीन के पास ईंधन के लिए ईरान के बदले दूसरे विकल्प कम हैं। ऐसे में ब्रिक्स देश अमेरिकी डॉलर पर से अपनी निर्भरता धीरे-धीरे कम करना चाह रहे हैं। ताकि किसी तरह के अमरीकी प्रतिबंध का असर ब्रिक्स देशों पर ना हो। साथ ही पांचों देश मिलकर एक एक्सचेंज का गठन का ऐलान कर सकते हैं जिसमें पांचों देशों के सूचकांक लिस्टेड होंगे और पांचों देश के नागरिक अपनी-अपनी करेंसी में उसमें कारोबार कर पाएंगे।
दुनिया की करीब आधी आबादी इन पांच देशों में रहते हैं। इसलिए ये पांच देश एक बड़े बाजार के तौर पर पूरी दुनिया में देखे जाते हैं। यूरोप और अमेरिकी में आर्थिक अनिश्चितता का माहौल है। ऐसे में अमेरिका और यूरोपीय देश भी ब्रिक्स देशों पर अपनी टकटकी लगाए हुए है। अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भी कई बार कह चुके हैं कि दुनियाभर के देशों की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में भारत चीन और ब्राजील जैसे देशों की अमह भूमिका होगी। लेकिन ब्रिक्स देशों की खुद की अर्थव्यवस्था अब सुस्त होती दिख रही है। ऐसे में इन देशों को पहले खुद को संभालने की ज़रूरत है।
लेबल:
चीन,
दक्षिण अफ्रीका,
ब्राजील,
ब्रिक्स,
भारत,
रूस,
BRICS इंडिया
बुधवार, 29 फ़रवरी 2012
जीडीपी विकास दर में भारी गिरावट
बजट से ठीक पहले जीडीपी के आंकड़े ने सरकार की नींद उड़ा दी है। भारत की जीडीपी विकास दर 33 महीनों के अपने निचले स्तर पर जा पहुंचा है। निवेश में कमी और महंगाई में बढ़ोतरी की वजह से जीडीपी विकास दर में ये गिरावट देखने को मिली है।
नौ फीसदी की विकास दर का सपना देखने वाले वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी को अब महज़ 7 फीसदी जीडीपी विकास दर हासिल करने के लिए भी एड़ी चोटी का पसीना बहाना पड़ रहा है। अक्टूबर से दिसंबर की तिमाही में भारत की जीडीपी विकास दर लुढ़ककर 6.1 फीसदी पर जा पहुंची। जो कि करीब तीन साल का सबसे निचला स्तर है। जुलाई से सिंतबर की तिमाही में जीडीपी विकास दर 6.9 फीसदी थी। पिछले लगातार 7 तिमाही से जीडीपी विकास दर में गिरावट जारी है। इसके कई कारण हैं। कच्चे सामानों की कीमतों में भारी बढ़ोतरी की वजह से इंडस्ट्री में होने वाले निवेश में कमी आई है। जिससे मैन्युफैक्चरिंग ग्रोथ में लगातार गिरावट देखी जा रही है। पिछले 5 वर्षों में पहली बार भारतीय अर्थव्यवस्था विकास की तेज़ रफ्तार के लिए तरसती नज़र आने लगी है। और इस स्थिति के लिए ग्लोबल परिस्थितियों के साथ ही सरकार की नीतियां जिम्मेदार हैं।
साल 2007 से साल 2009 तक भारत की आर्थिक विकास दर औसतन 9.5 फीसदी थी। जबकि पिछले 2 साल में भारतीय अर्थव्यवस्था औसतन 8.4 फीसदी की दर से बढ़ी है। ऐसे में सरकार को एक बार फिर से रिफॉर्म तेज़ करने की ज़रूरत है। नहीं तो डबल डिजिट में विकास दर हासिल करने का सपना कभी साकार नहीं हो पाएगा।
नौ फीसदी की विकास दर का सपना देखने वाले वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी को अब महज़ 7 फीसदी जीडीपी विकास दर हासिल करने के लिए भी एड़ी चोटी का पसीना बहाना पड़ रहा है। अक्टूबर से दिसंबर की तिमाही में भारत की जीडीपी विकास दर लुढ़ककर 6.1 फीसदी पर जा पहुंची। जो कि करीब तीन साल का सबसे निचला स्तर है। जुलाई से सिंतबर की तिमाही में जीडीपी विकास दर 6.9 फीसदी थी। पिछले लगातार 7 तिमाही से जीडीपी विकास दर में गिरावट जारी है। इसके कई कारण हैं। कच्चे सामानों की कीमतों में भारी बढ़ोतरी की वजह से इंडस्ट्री में होने वाले निवेश में कमी आई है। जिससे मैन्युफैक्चरिंग ग्रोथ में लगातार गिरावट देखी जा रही है। पिछले 5 वर्षों में पहली बार भारतीय अर्थव्यवस्था विकास की तेज़ रफ्तार के लिए तरसती नज़र आने लगी है। और इस स्थिति के लिए ग्लोबल परिस्थितियों के साथ ही सरकार की नीतियां जिम्मेदार हैं।
साल 2007 से साल 2009 तक भारत की आर्थिक विकास दर औसतन 9.5 फीसदी थी। जबकि पिछले 2 साल में भारतीय अर्थव्यवस्था औसतन 8.4 फीसदी की दर से बढ़ी है। ऐसे में सरकार को एक बार फिर से रिफॉर्म तेज़ करने की ज़रूरत है। नहीं तो डबल डिजिट में विकास दर हासिल करने का सपना कभी साकार नहीं हो पाएगा।
सोमवार, 27 फ़रवरी 2012
कल होगी महा-हड़ताल
देशभर में कल होने वाली है महा-हड़ताल। बैंक, सरकारी और निजी फैक्ट्री में काम नहीं करेंगे मज़दूर। ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन भी हड़ताल में हैं शामिल। देश के ज्यादातर मज़दूर और कर्मचारी यूनियनों ने कई सूत्री मांगों को लेकर एक दिन की हड़ताल का ऐलान किया है।
कल एक जगह से दूसरी जगह जाने के में हो सकती है परेशानी। क्योंकि ऑटो टैक्सी और ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन रहेंगे हड़ताल पर। सरकारी और निजी बैंकों में भी काम-काज रहेगा ठप्प। बढ़ती बेरोजगारी, कमरतोड़ महंगाई, घोटालों, भ्रष्टाचार, श्रम नियमों को लागू करने और आम आदमी के दमन के विरोध में देश के ज्यादातर ट्रेड यूनियंस और दूसरे संगठनों ने 28 फरवरी को राष्ट्रव्यापी हड़ताल करने का फैसला किया है। इस दौरान देशभर में मज़दूर और कर्मचारी संगठनों ने जुलुस और चक्का जाम का प्लान बनाया है।
हड़ताल की वजह से 28 फारवरी को सरकारी, निजी सहित ग्रामीण बैंकों में भी कामकाज ठप्प रहेगा।देश के कई ट्रांसपोर्ट एसोसिएशनों भी हड़ताल में शामिल होंगे। जिससे यातायात व्यवस्था पर असर पड़ेगा। रिटेल क्षेत्र में एफडीआई का विरोध कर रही स्वदेशी जागरण मंच ने भी हड़ताल का समर्थन करने का फैसला किया है।
केन्द्र सरकार की कर्मचारी विरोधी नितियों के चलते केन्द्रीय श्रम संगठनों और कई फेडरेशन ने एकजुट होकर भारतीय इतिहास में पहली बार इतने बड़े पैमाने पर हड़ताल पर जा रहे हैं। इसलिए इसका असर देशभर में देखने को मिल सकता है।
कल एक जगह से दूसरी जगह जाने के में हो सकती है परेशानी। क्योंकि ऑटो टैक्सी और ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन रहेंगे हड़ताल पर। सरकारी और निजी बैंकों में भी काम-काज रहेगा ठप्प। बढ़ती बेरोजगारी, कमरतोड़ महंगाई, घोटालों, भ्रष्टाचार, श्रम नियमों को लागू करने और आम आदमी के दमन के विरोध में देश के ज्यादातर ट्रेड यूनियंस और दूसरे संगठनों ने 28 फरवरी को राष्ट्रव्यापी हड़ताल करने का फैसला किया है। इस दौरान देशभर में मज़दूर और कर्मचारी संगठनों ने जुलुस और चक्का जाम का प्लान बनाया है।
हड़ताल की वजह से 28 फारवरी को सरकारी, निजी सहित ग्रामीण बैंकों में भी कामकाज ठप्प रहेगा।देश के कई ट्रांसपोर्ट एसोसिएशनों भी हड़ताल में शामिल होंगे। जिससे यातायात व्यवस्था पर असर पड़ेगा। रिटेल क्षेत्र में एफडीआई का विरोध कर रही स्वदेशी जागरण मंच ने भी हड़ताल का समर्थन करने का फैसला किया है।
केन्द्र सरकार की कर्मचारी विरोधी नितियों के चलते केन्द्रीय श्रम संगठनों और कई फेडरेशन ने एकजुट होकर भारतीय इतिहास में पहली बार इतने बड़े पैमाने पर हड़ताल पर जा रहे हैं। इसलिए इसका असर देशभर में देखने को मिल सकता है।
शनिवार, 25 फ़रवरी 2012
5.5 लाख की कमाई टैक्स नेट से बाहर !
इस बजट में इनकम टैक्स भरने वाले मिडिल क्लास को कुछ राहत मिल सकती है। क्योंकि सरकार टैक्स छूट की सीमा 3 लाख रुपए तक करने पर विचार कर रही है। फिलहाल टैक्स छूट की सीमा 1 लाख 80 हज़ार रुपए है। साथ ही निवेश पर टैक्स छूट ढ़ाई लाख रुपए की जा सकती है।
टैक्स छूट की सीमा 3 लाख रुपए तक बढ़ सकती है। क्योंकि डायरेक्ट टैक्स कोड यानी डीटीसी पर बनी संसदीय समिति ने बजट 2012 में टैक्स छूट की सीमा को बढ़ाकर 3 लाख रुपये करने की सिफारिश की है। डीटीसी पर बनी समिति के अध्यक्ष यशवंत सिन्हा ने नए प्रस्ताव को हरी झंडी दे दी है। हालांकि इस पर अंतिम फैसला वित्त मंत्रालय को लेना है। फिलहाल 1 लाख 80 हजार रुपए कमाने वाले टैक्स नेट से बाहर हैं। साथ ही यादि कोई व्यक्ति इससे ज्यादा कमाई करता है तो उसे भी 1 लाख 80 हजार रुपए की कमाई पर टैक्स नहीं देना पड़ता है।
ऐसे में अगर ये छूट 3 लाख रुपए तक कर दी जाती है तो इससे आम लोगों को काफी राहत मिलेगी। क्योंकि उनकी कमाई का एक बड़ा हिस्सा फिलहाल टैक्स में चला जाता है। इसके साथ ही सरकार दूसरे निवेश पर टैक्स छूट की सीमा 1 लाख 55 हजार रुपए से बढ़ाकर ढ़ाई लाख रुपए करने पर विचार कर रही है। यानी की निवेश और बचत को जोड़कर कुल साढ़े पांच लाख रुपए की कमाई करने वाले लोग इनकम टैक्स नेट से बच सकते हैं।
टैक्स छूट की सीमा 3 लाख रुपए तक बढ़ सकती है। क्योंकि डायरेक्ट टैक्स कोड यानी डीटीसी पर बनी संसदीय समिति ने बजट 2012 में टैक्स छूट की सीमा को बढ़ाकर 3 लाख रुपये करने की सिफारिश की है। डीटीसी पर बनी समिति के अध्यक्ष यशवंत सिन्हा ने नए प्रस्ताव को हरी झंडी दे दी है। हालांकि इस पर अंतिम फैसला वित्त मंत्रालय को लेना है। फिलहाल 1 लाख 80 हजार रुपए कमाने वाले टैक्स नेट से बाहर हैं। साथ ही यादि कोई व्यक्ति इससे ज्यादा कमाई करता है तो उसे भी 1 लाख 80 हजार रुपए की कमाई पर टैक्स नहीं देना पड़ता है।
ऐसे में अगर ये छूट 3 लाख रुपए तक कर दी जाती है तो इससे आम लोगों को काफी राहत मिलेगी। क्योंकि उनकी कमाई का एक बड़ा हिस्सा फिलहाल टैक्स में चला जाता है। इसके साथ ही सरकार दूसरे निवेश पर टैक्स छूट की सीमा 1 लाख 55 हजार रुपए से बढ़ाकर ढ़ाई लाख रुपए करने पर विचार कर रही है। यानी की निवेश और बचत को जोड़कर कुल साढ़े पांच लाख रुपए की कमाई करने वाले लोग इनकम टैक्स नेट से बच सकते हैं।
शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012
3 साल के एफडी पर टैक्स में छूट
पांच साल के बदले 3 साल के बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट पर टैक्स छूट देने पर सरकार विचार कर रही है। इसका ऐलान आगामी आम बजट में वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी कर सकते हैं। इससे टैक्स भरने वाले मिडल क्लास को कुछ राहत मिल सकती है।
टैक्स बचत के लिए अब ज्यादा समय तक अपने पैसे बैंकों में जमा करने की ज़रूरत नहीं होगी। क्योंकि टैक्स में छूट के लिए बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट की सीमा 3 साल की जा सकती है। वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी 16 मार्च को बजट पेश करने के दैरान इसका ऐलान कर सकते हैं। यानी कि आने वाले वर्षों में 80 सी के तहत टैक्स सेविंग के लिए बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट एक बेहतरीन विकल्प बनने वाला है। क्योंकि इसके अलावे जो दूसरे टैक्स सेविंग प्रोडक्ट हैं वो इतने प्रभावी नहीं है।
- पीपीएफ यानी पब्लिक प्रोविडेंट फंड में 15 साल का लॉकिन पीरियड है। हालांकि 7 साल बाद निवेशक चाहे तो पैसे निकाल सकता है। इसपर 8.6 फीसदी रिटर्न मिलता है। जो कि टैक्स फ्री है।
- जबकि एनएससी यानी नेशनल सेविंग सर्टिफिकेट में लॉकिन पीरियड 6 साल का है। जिसपर 8 फीसदी रिटर्न मिलता है। हालांकि इसपर टैक्स लगता है।
- इएलएसएस यानी इक्विटी लिंक्ड सेविंग स्कीम में 3 साल का लॉकिन पीरियड है। लेकिन इसपर रिटर्न की कोई गारंटी नहीं है। शेयर बाजार की स्थिति ठीक रहने पर इसपर बेहतर रिटर्न मिल सकता है। जो कि टैक्स फ्री होगा।
- फिलहाल बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट के लिए 5 साल का लॉकिन पीरियड है। और इसपर 8.75 फीसदी का रिटर्न मिलता है।
दरअसल ऊंची ब्याज दर का दौर आने वाले दिनों में खत्म होने वाला है। ऐसे में लोग पांच साल के लिए अपना पैसा बैंकों में फंसाना नहीं चाहेंगे। और ऐसा होने पर लिक्विडिटी और बैड लोन की समस्य से जूझ रहे बैंकों की स्थिति और नाजुक हो सकती है। ऐसे में सरकार टैक्स सेविंग के लिए बैंक एफडी की सीमा कम कर आम लोगों के साथ ही बैंकों को राहत पहुंचा सकती है।
टैक्स बचत के लिए अब ज्यादा समय तक अपने पैसे बैंकों में जमा करने की ज़रूरत नहीं होगी। क्योंकि टैक्स में छूट के लिए बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट की सीमा 3 साल की जा सकती है। वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी 16 मार्च को बजट पेश करने के दैरान इसका ऐलान कर सकते हैं। यानी कि आने वाले वर्षों में 80 सी के तहत टैक्स सेविंग के लिए बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट एक बेहतरीन विकल्प बनने वाला है। क्योंकि इसके अलावे जो दूसरे टैक्स सेविंग प्रोडक्ट हैं वो इतने प्रभावी नहीं है।
- पीपीएफ यानी पब्लिक प्रोविडेंट फंड में 15 साल का लॉकिन पीरियड है। हालांकि 7 साल बाद निवेशक चाहे तो पैसे निकाल सकता है। इसपर 8.6 फीसदी रिटर्न मिलता है। जो कि टैक्स फ्री है।
- जबकि एनएससी यानी नेशनल सेविंग सर्टिफिकेट में लॉकिन पीरियड 6 साल का है। जिसपर 8 फीसदी रिटर्न मिलता है। हालांकि इसपर टैक्स लगता है।
- इएलएसएस यानी इक्विटी लिंक्ड सेविंग स्कीम में 3 साल का लॉकिन पीरियड है। लेकिन इसपर रिटर्न की कोई गारंटी नहीं है। शेयर बाजार की स्थिति ठीक रहने पर इसपर बेहतर रिटर्न मिल सकता है। जो कि टैक्स फ्री होगा।
- फिलहाल बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट के लिए 5 साल का लॉकिन पीरियड है। और इसपर 8.75 फीसदी का रिटर्न मिलता है।
दरअसल ऊंची ब्याज दर का दौर आने वाले दिनों में खत्म होने वाला है। ऐसे में लोग पांच साल के लिए अपना पैसा बैंकों में फंसाना नहीं चाहेंगे। और ऐसा होने पर लिक्विडिटी और बैड लोन की समस्य से जूझ रहे बैंकों की स्थिति और नाजुक हो सकती है। ऐसे में सरकार टैक्स सेविंग के लिए बैंक एफडी की सीमा कम कर आम लोगों के साथ ही बैंकों को राहत पहुंचा सकती है।
दिल्ली में कमाई से ज्यादा खर्चे बढ़े
दिल्ली में रहने वाले लोगों की कमाई भले ही देश के दूसरे राज्यों से ज्यादा हो। लेकिन ये कमाई उनका बैंक बैलेंस नहीं बन पा रहा है। क्योंकि ना चाहते हुए भी कमाई का एक बड़ा हिस्सा स्वास्थ्य, बच्चों की शिक्षा और रेंट पर उन्हें खर्च करना पड़ता है।
दिल्ली में परिवार साल दर साल छोटा होता जा रहा है। लेकिन उनके खर्चे बढ़ते जा रहे हैं। इसी का नतीजा है कि ज्यादा कमाई करने के बावजूद दिल्ली के लोग खर्चे से परेशान रहते हैं। कमाई का एक बड़ा हिस्सा दिल्ली में रहने वालों को हॉस्पिटल, बच्चों के ट्यूशन फीस, रेंड और फूड पर खर्च करना पड़ता है। प्रदूषण, मिलावटी खाद्य पदार्थों और गलत लाइफ स्टाइल ने दिल्लीवासी का हॉस्पिटल बिल बढ़ा दिया है। पिछले 6 सालों में महंगाई ने दिल्ली वालों की कमर तोड़ दी है।
- हॉस्पिटल बिल 240 फीसदी बढ़ा है।
- दबाईयां और हॉस्पिटल के बाहर टेस्ट के खर्चे में 129 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है।
- मकान किराए में 186 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
- बच्चों की पढ़ाई और ट्यूशन फीस 126 फीसदी बढ़ा है।
दिल्ली वालों को कमाई का 36 फीसदी खान-पान पर खर्च करना पड़ता है। वो भी तब...जब दिल्ली में परिवार सिकुरते जा रहे हैं। एक परिवार में लोगों की औसत संख्या घटकर 4.5 लोगों की रह गई है। ऐसे में भले ही सरकार ही दिल्लीवालों की बढ़ती कमाई का ढ़िढोरा पीट रही हो। लेकिन सच्चाई ये है कि बढ़ती कमाई के बावजूद दिल्लीवालों को महीने के आखिर तक कुछ नहीं बचता।
दिल्ली में परिवार साल दर साल छोटा होता जा रहा है। लेकिन उनके खर्चे बढ़ते जा रहे हैं। इसी का नतीजा है कि ज्यादा कमाई करने के बावजूद दिल्ली के लोग खर्चे से परेशान रहते हैं। कमाई का एक बड़ा हिस्सा दिल्ली में रहने वालों को हॉस्पिटल, बच्चों के ट्यूशन फीस, रेंड और फूड पर खर्च करना पड़ता है। प्रदूषण, मिलावटी खाद्य पदार्थों और गलत लाइफ स्टाइल ने दिल्लीवासी का हॉस्पिटल बिल बढ़ा दिया है। पिछले 6 सालों में महंगाई ने दिल्ली वालों की कमर तोड़ दी है।
- हॉस्पिटल बिल 240 फीसदी बढ़ा है।
- दबाईयां और हॉस्पिटल के बाहर टेस्ट के खर्चे में 129 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है।
- मकान किराए में 186 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
- बच्चों की पढ़ाई और ट्यूशन फीस 126 फीसदी बढ़ा है।
दिल्ली वालों को कमाई का 36 फीसदी खान-पान पर खर्च करना पड़ता है। वो भी तब...जब दिल्ली में परिवार सिकुरते जा रहे हैं। एक परिवार में लोगों की औसत संख्या घटकर 4.5 लोगों की रह गई है। ऐसे में भले ही सरकार ही दिल्लीवालों की बढ़ती कमाई का ढ़िढोरा पीट रही हो। लेकिन सच्चाई ये है कि बढ़ती कमाई के बावजूद दिल्लीवालों को महीने के आखिर तक कुछ नहीं बचता।
लेबल:
कमाई,
खर्च,
दिल्ली,
बिल ट्यूशन हॉस्पिटल दिल्ली
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