Saturday, July 30, 2011

संकट में दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था

अमेरिका कर्ज संकट के मुहाने पर खड़ा है। दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था डिफाउटर बनने की कगार पर है। अमेरिका के राष्ट्रपति बराम ओबामा की डेमोक्रेटिक पार्टी कर्ज सीमा बढ़ाना चाहती है। जबकि विपक्षी दल यानी रिपब्लिकन इसका विरोध कर रहे हैं। अमरीकी सीनेट कर्ज सीमा को बढ़ाने वाले एक बिल को ख़ारिज कर दिया है। इससे पहले इस बिल अमरीकी के हाउस ऑफ़ रिप्रेजेंटिव यानि प्रतिनिधि सभा ने पास कर दिया था। अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर कर्ज के बादल मंडरा रहे हैं। डेमोक्रेटिक पार्टी के बहुमत वाली सीनेट में कर्ज सीमा बढ़ाने वाला बिल पास नहीं हो पाया। इस बिल के गिरने की आशंका पहले से ही जताई जा रही थी। दरअसर रिपब्लिकन पार्टी की बहुमत वाली प्रतिनिधि सभा ने सरकारी खर्चे में कटौती की शर्त पर कर्ज की सीमा बढ़ाने वाली बिल पर मुहर लगाई थी। लेकिन इसपर डेमोक्रेटिक पार्टी की बहुमत वाली सीनेट में सहमति नहीं मिल पाई। और इस बिल सीनेट में दम तोड़ दिया। अब दो अगस्त इसपर बातचीत होगी। अगर दो अगस्त तक ये मसला नहीं सुलझता है तो अमरीका में नकदी की समस्या पैदा हो जाएगी। इसके साथ ही कर्ज़े लौटाने की अमेरिका की रेटिंग भी प्रभावित होगी। कर्ज सीमा बढ़ाने वाले बिल को लेकर अमेरिका के दोनों राजनीतिक दलों रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक पार्टी में भारी मतभेद रहे हैं। रिपब्लिकन पार्टी चाहती है कि कम अवधि के कर्ज की सीमा 900 बिलियन डॉलर तक ही की जाए। लेकिन डेमोक्रेट्स इस सीमा को और अधिक करने के पक्ष में हैं। अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा है कि अगर राजनीतिक दलों ने देश के कर्ज़ संकट को निबटाने के उपाय के बारे में जल्दी समझौता नहीं किया तो सारे अमरीकी लोगों को इससे परेशान होना पड़ेगा। दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अगर डिफाउल्टर हो जाती है तो इसका असर पूरी दुनिया पर देखने को मिलेगा। अमेरिका में सरकार कानूनी रूप से एक सीमा तक ही कर्ज ले सकती है। यह सीमा फिलहाल 14.3 खरब डॉलर की है। लेकिन अमेरिकी सरकार मई में ही इस सीमा तक पहुंच चुकी है। यानी अब अगर यह सीमा नहीं बढ़ाई जाती है तो सरकार के पास भुगतान के लिए पैसा नहीं होगा। अमेरिका के पास कर्ज सीमा बढ़ाने के लिए मंगलवार तक का वक्त है। और अगर कर्ज बढ़ाने पर सहमति नहीं हो पाती है तो दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला ये देश अपने सभी भुगतान करने की काबिलियत खो बैठेगा। और इसका असर दुनियाभर में दिखाई देगा।

Thursday, July 28, 2011

भ्रष्टाचार भूल जाओ ग्रोथ याद रखो

गृह मंत्री ने कहा कि फिलहाल देश को ग्रोथ के बारे में पहले और भ्रष्टाचार और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर बाद में सोचना चाहिए। फिक्की के एक समारोह में गृह मंत्री ने ये बात कही। चिदंबरम का नाम बार-बार टू जी घोटाले में आ रहा है। पूर्व टेलीकॉम मिनिस्ट ऐ राजा के बाद पूर्व टेलीकॉम सेक्रेट्री सिद्धार्थ बेहुरा ने भी चिदंबरम का नाम लिया है। बेहुरा ने कहा कि टेलीकॉम लाइसेंस की इंट्री फी पर जब बैठक हो रही थी तो उस बैठक में चिदंबरम मौजूद थे। उस दौरान चिदंबरम वित्त मंत्री थे। इसके साथ ही मुंबई में हुए बम धमाके के बाद भी गृहमंत्रालय की नाकामयाबी सामने आई है। ऐसे में चिदंबरम के खिलाफ राजनीतिक गलियारे में माहौल तैयार हो रहा है। और इस माहौल से लोगों का ध्यान बंटाने के लिए चिदंबरम ग्रोथ, बदलाव और रिफॉर्म की राग अलाप रहे हैं। चिदंबरम ने कहा कि फिलहाल देश के सेंटर स्टेज पर यही मुद्दे होनी चाहिए ना कि सुरक्षा और भ्रष्टाचार। भ्रष्टाचार के रहते हुए किस तरह से ग्रोथ और रिफॉर्म का फायदा लोगों तक पहुंच पाएगा ये बात किसी को समझ नहीं आ रही है। ऐसे ही केंद्र की ओर से जो भी स्कीम चलाए जा रहे हैं उसमें आकंठ भ्रष्टाचार समाया हुआ है। महंगाई अभी भी नौ फीसदी से ऊपर है। ऐसे में अगर सरकार भ्रष्टाचार को दूसरी पंक्ति में रखने की बात कर रही है। तो इससे सरकार की मंशा साफ हो जाती है। चिदंबरम का ये बयान उनकी टू जी घोटाले में फंसने के बाद उनपर बढ़ने वाले दबाव के बाद बौखलाहट में दिया गया बयान लगता है।

घर खरीदने का सही समय आने वाला है

घर का सपना देख रहे लोगों का सपना अब सच हो सकता है। खासकर वैसे लोगों का जिन्होंने अभी घर नहीं बुक कराया है। क्योंकि आने वाले दिनों में घर की कीमतों 20 फीसदी तक की कमी आ सकती है। रिजर्ब बैंक की सख्त मुद्रा पॉलिसी के बाद रियल एस्टेट सेक्टर में करेक्शन आने वाला है। और ऐसे में घर की कीमतों में जबरदस्त गिरावट आ सकती है। पहले से ही कुछ सुस्त हो चुके रियल एस्टेट की रफ्तार रेपो रेट बढ़ने की वजह से और धीमी होगी। ऐसे में बिल्डर्स को फ्लैट की कीमतें ज़मीन पर लानी होगी। क्योंकि हर फ्लैट पर बिल्डर्स कई गुना प्रॉफिट कमाते हैं। जानकारों का मानना है कि महंगे होम लोने की वजह से घर के ग्राहक तेजी से दूर भाग रहे हैं। ऐसे में ग्राहकों को वापस लाने के लिए देशभर में फ्लैट की कीमतों में 5 से 20 फीसदी तक की कमी दर्ज की जा सकती है। देश की रियल एस्टेट कंपनियां एक के बाद एक प्रोजेक्ट का ऐलान कर बैंकों से काफी कर्ज उठा चुकी है। और अब उनपर ब्याज देने का संकट मंडरा रहा है। रेपो रेट के आठ फीसदी पर पहुंच जाने की वजह से बैंके से अब फाइनेंस कराने में उन्हें दिक्कत आ सकती है। एचएसबीसी की एग्जिक्युटिव डायरेक्टर और कंट्री हेड नैना लाल किदवई ने कहा है कि रिलय एस्टेट क्षेत्र में इन्वेस्टमेंट पर असर पड़ेगा। इसके साथ ही किदवई ने कहा कि उन्हें ऐसा लगता है कि ब्याज दरें अब अपनी उच्चतम स्तर पर पहुंच चुकी हैं। होम लोन दरों में 50 बेसिस प्वाइंट यानी आधा फीसदी की बढ़ोतरी होने पर 30 लाख रुपए के घर पर ईएमआई में 1000 रुपए से ज्यादा का इजाफा हो जाएगा। ऐसे में लोग तभी घर खरीदेंग जब उन्हें सस्ते घर मिल पाएंगे। हालांकि देशभर के मुकाबले एनसीआर में घरों की कीमतों में ज्याद कमी नहीं आएगी। ऐसे में उन लोगों के लिए सही समय आने वाला है जो काफी समय से महंगे होने की वजह से घर नहीं बुक करा पा रहे थे। साथ ही वैसे ग्राहक जो एक मुश्त पैसे देकर निवेश के लिए घर खरीदना चाह रहे हैं। हालांकि नोएडा एक्सटेंसन विवाद की वजह से नोएडा के आस-पास ज्यादा कीमतें नहीं कम होंगी। क्योंकि एक्सटेंशन की टेंशन की वजह से वहां घर खरीदने की सोच रहे लोग अब आस-पास के इलाके में ऑप्शन तलाशेंगे।

Tuesday, July 26, 2011

रेपो रेट बढ़ने से बढ़ेगा ईएमआई का बोझ

कार लोन, होम लोन, एजुकेशन लोन सहित हर तरह के कर्ज हो जाएंगे महंगे। क्योंकि आरबीआई यानी रिजर्ब बैंक ऑफ इंडिया ने रेपो रेट बढ़ा दिए हैं। रेपो रेट वो दर होता है जिसपर बैंकों को रिजर्ब बैंक से पैसे मिलते हैं। मौद्रिक नीति की तिमाही समीक्षा के दौरान रिज़र्व बैंक ने रिवर्स रेपो रेट में भी आधा फीसदी की बढ़ोतरी कर दी है। महंगाई से पहले से परेशान लोगों पर अब ज्यादा ईएमआई का बोझ बढ़ने वाला है। साथ ही घर और कार का सपना देखने वालों का सपना फिलहाल पूरा नहीं हो पाएगा। क्योंकि रेपो रेट बढ़ने के बाद हर तरह का कर्ज महंगा हो जाएगा। रिज़र्ब बैंक ने मौद्रिक नीति की तिमाही समीक्षा के दौरान रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट में बढ़ोतरी कर दी है। रेपो रेट 7.5 फीसदी से बढ़कर 8 फीसदी पर पहुंच गया है। वहीं रिवर्स रेपो रेट 6.5 फीसदी से बढ़कर 7 फीसदी पर पहुंच गया है। रेपो रेट वो दर है जिसपर देश के सभी बैंक रिजर्व बैंक से कर्ज लेते हैं। जबकि रिजर्व बैंक में पैसे जमा करने पर बैंको को जिस दर पर ब्याज मिलता है उसे रिवर्स रेपो रेट कहते हैं। रिजर्व बैंक ने महंगाई पर लगाम लगाने के लिए पिछले 16 महीनों में अहम दरों में 11 बार इजाफा किया है। जिससे दरों में पौने पांच फीसदी तक बढ़ोतरी हुई है। केवल पिछले तीन महीनों में आरबीआई तीन बार ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर चुका है। मई में रिज़र्व बैंक ने दरों में 50 बेसिस प्वाइंट और जून में 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी की थी। रेपो रेट में बढ़ोतरी से बैंको को महंगा कर्ज मिलेगा। जिसकी भरपाई के लिए बैंक आम लोगों को उंची दरों पर लोन देगा। यानी पहले से महंगाई में पिस रही जनता और बोझ बढ़ेगा।

Monday, July 25, 2011

शेवरले बीट का डीज़ल वर्जन लांच

भारतीय छोटी कार बाजार के डीज़ल सेग्मेंट में मारुति को मिलने वाली है कड़ी टक्कर। क्योंकि कार बनाने वाली दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी जेनरल मोटर्स ने लांच कर दिया है शेवरले बीट का डीज़ल वर्जन। शेवरले बीट की कीमत इस सेग्मेंट की दूसरी कार के मुकाबले कम है जबकि माइलेज ज्यादा है। जेनरल मोटर्स ने बीट के डीजल वर्जन को भारतीय बाजार में लांच कर दिया है। इस कार में लगा है आधुनिक स्मार्टेक इंजन। भारतीय रोड और ट्रैफिक की स्थिति को देखते हुए खासतौर इस इंजन को बनाया गया है। भारतीय बाजार में बीट की टक्कर मारुति स्विफ्ट, रिट्ज और फोर्ड फिगो से होगी। जेनरल मोटर्स इंडिया के वाइस प्रेसीडेंट सेल्स सुमित साहनी का कहना है कि ये कार भारतीय ग्राहकों के लिए एक कम्प्लीट पैकेज है। क्योंकि इसकी कीमत कम है, माइलेज ज्यादा और ये आधुनिक तकनीकों से लैस है। बीट की माइलेज 24 किलोमीटर प्रति लीटर है। कंपनी का दावा है कि शेवरले बीट भारत में सबसे ज्यादा माइलेज देने वाली डीज़ल कार है। स्विफ्ट,रिट्ज और फिगो के मुकाबले शेवरले बीट की कीमत कम यानी केवल 4 लाख 29 हजार रुपए रखी गई है। इंट्री लेवल मारुति स्विफ्ट बीट से 70 हजार रुपए ज्यादा महंगी है। वहीं रिट्ज की कीमत 4 लाख 85 हजार और फिगो की कीमत 4 लाख 59 हजार रुपए है। जेनरल मोटर्स इंडिया के एमडी का दावा है कि डीजल कार की एक और खामी को ने दूर भगाने की कोशिश इस इंजन में की गई है। बीट का इंजन दूसरी डीजल कारों के मुकाबले कम शोर मचाता है। इस लिए इसे साइलेंट डीज़ल कार भी कह सकते हैं। पेट्रोल की आसमान छूती कीमतों की वजह से भारतीय कार खरीदारों की रुझान डीजल की तरफ बढ़ा है। पिछले कुछ महीनों में डीजल कारों की बिक्री में जबरस्त तेजी आई है। ऐसे में जेनरल मोटर इस सेग्मेंट में अपना प्रभाव बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाह रही है। ऐसा माना जा रहा है कि डीजल हैचबैक सेग्मेंट में शेवरले बीट अपनी खास जगह बना लेगी।

Saturday, July 23, 2011

63 लाख बनाम 10 लाख नौकरियां

यूपीए वन के कार्यकाल में नौकरियों के अवसर में जबरदस्त कमी आई है। सरकारी संस्था नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस यानी एनएसएसओ की एक रिपोर्ट में ये बात सामने आई है। ये रिपोर्ट सरकार के गले में अटक गई है। ना तो उसे ये उगलने में बन रहा है और ना ही निगलने में। बीजेपी सहित तमाम विरोधी दलों ने इस मुद्दे को कैश करना शुरू कर दिया है। मिनिस्ट्री ऑफ स्टेटिस्टिक्स के तहत आने वाली सरकारी संस्था नेशनल सैंपल सर्वे ने एक रिसर्च रिपोर्ट जारी कर यूपीए सरकार के पैरों तले से ज़मीन सरकार दी है। इस रिपोर्ट में ये खुलासा किया गया है कि यूपीए वन के कार्यकाल यानी 2004 से 2009 के दौरान केवल 10 लाख नौकरियों के अवसर पैदा हुए। जबकि एनडीए के कार्यकाल यानी 1999 से 2004 के दौरान कुल 63 लाख लोगों को नौकरियां मिली। एनएसएसओ की ये रिपोर्ट विरोधी पार्टियों के लिए सरकार के खिलाफ बैठे बिठाए एक और मुद्दे के तौर पर मिल गया। जिसे एनडीए कैश कराने से नहीं चूकना चाह रही है। जानकारों का मानना है कि मनरेगा और दूसरी योजनाओं के होते हुए भी रोजगार में कमी एक चिंता का विषय है। तेजी से बढ़ते जडीपी के बावजूद अगर रोजगार कम हुए हैं तो जरूर सरकार की आर्थिक नीतियों में कहीं ना कहीं चूक हुई है। और ये देश के लिए ठीक नहीं है। बीजेपी सहित दूसरे दलों के लोगों ने भी सरकार की आर्थिक नीतियों के खिलाफ विरोध शुरू कर दिया है। यूपीए वन के कार्यकाल के दौरान हर साल केवल 2 लाख लोगों को नौकरी मिली जबकि एनडीए के कार्यकाल में रोजगार कि संख्यां प्रति वर्ष 12 लाख को पार कर गईं थी। जानकार इसकी वजह इकॉनोमी की संरचना में गलत बदलाव को दे रहे हैं। एनएसएसओ की ये रिपोर्ट सरकार के लिए एक नयी मुसीबत लेकर आई है। पहले से भ्रष्टाचार के मुद्दे पर पूरी तरह घिर चुकी यूपीए टू सरकार को अब यूपीए वन के रिपोर्ट कार्ड का सामना करना पड़ रहा है। मनरेगा और दूसरे रोजगार के अवसर को मुद्दा बनाकर कांग्रेस की बहुमत वाली सरकार यूपीए वन से यूपीए टू तक भले ही पहुंच गई हो लेकिन सच्चाई के सामने आने पर उसके पास जवाब नहीं मिल रहा है।

Friday, July 22, 2011

FCI भाड़े पर लेगा प्राइवेट गोदाम

खाद्य मंत्र के वी थॉमस ने कहा है कि जगह की कमी की वजह से अनाजों को अब सड़ने नहीं दिया जाएगा। थॉमस ने अनाजों को रखने के लिए एफसीआई यानी फूड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया को भाड़े पर प्राइवेट गोदाम लेने के निर्देश दिए हैं। हालांकि अनाज के एक्सपोर्ट के हिमामयती थॉमस कम कीमत पर नॉन बासमती राइस के एक्सपोर्ट की इजाज़त पर चुप्पी साध गए। खाद्य मंत्री प्रोफेसर के वी थॉमस ने अनाज के रख-रखाव में आने वाली दिक्कतों को सुलझाने के लिए सभी राज्यों के कंसल्टेटिव कमेटी के चेयरमैन से मुलाकात की। एफसीआई यानी फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया द्वारा आयोजित इस बैठक में थॉमस ने अहम फैसला लेते हुए प्राइवेट गोदामों को भाड़े पर लेने की अनुमति एफसीआई को दे दी है। हालांकि थॉमस ने निर्यात किए जाने वाले नॉन बासमती चावलों की कीमतों पर कुछ नहीं कहा। थॉमस अच्छी फसल और गोदामों में जगह की कमी का रोना रोककर अनाजों के एक्सपोर्ट के लिए सरकार को सहमत तो कर लिया। लेकिन कम कीमत की जिम्मेदारी वाणिज्य मंत्रालय के पाले में डाल गए। थॉमस ने कहा कि कीमतें तय करना वाणिज्य मंत्रालय का काम है। सरकार ने 10 लाख टन एक्सपोर्ट की जाने वाली नॉन बासमती चावल की कीमत प्रति क्विंटल केवल 400 डॉलर रखी है। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अनाज की कमी को देखते हुए जानकार इसे बहुत कम मान रहे हैं। यानी इससे ट्रेडरों के साथ ही किसानों को भी नुकसान उठाना पड़ेगा। खाद्य मंत्री को ने इससे पहले भी राज्य सरकारों को चेतावनी दे चुके हैं कि या तो वो अपने हिस्से की अनाज गोदामों से ले जाएं नहीं तो उनका कोटा खत्म कर दिया जाएगा। थॉमस की बौखलाहट से ऐसा लगता है कि इस बार वो किसी भी कीमत पर अनाज को सड़ने या खुले आसमान के नीचे पड़ा नहीं देखना चाहते। भले ही उसे कौड़ियों के भाव विदेशियों के हाथ क्यों नहीं बेच दिए जाएं!

Thursday, July 21, 2011

85 हजार में थ्री डी लैपटॉप 10 हजार में एलईडी टीवी

जापानी कंपनी तोशीबा इस साल के आखिर तक भारत में ही अपना प्रोडक्ट तैयार करेगी। यानी भारत में अपना पहला प्रोडक्शन यूनिट लगाएगी। कीमतों में कमी और और अपने ब्रांड को मजबूत करने लिए कंपनी ने ये फैसला किया है। इससे भारत में रोजगार के कुछ अबसर बढ़ेंगे। इसके साथ ही कंपनी ने थ्रीडी लैपटॉप और एलईडी टीवी की नई रेंज लांच की है। तेजी से बढ़ रहे भारतीय बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए जापानी कंपनी तोशीबा ने भारत में ही अपना प्रोडक्शन यूनिट लगाने का फैसाला किया है। इस साल के अंत तक भारतीय प्लांट से तोशीबा के इलेक्ट्रॉनिक प्रोडक्ट निकलना शुरू हो जाएगा। सबसे पहले कंपनी यहां टीवी बनाना चाहती है। ऐसा करने से प्रोडक्शन कॉस्ट में कमी आएगी। जिसका फायदा कंपनी और भारतीय ग्राहकों को होगा। क्योंकि इससे टीवी और सस्ते हो जाएंगे। इसके साथ ही तोशीबा ने दुनिया की पहली ग्लासेज फ्री थ्री डी लैपटॉप लांच कर दिया है। जो कि थ्री डी और टू डी दोनों मोड पर काम करता है। यानी इस लैपटॉप में थ्री डी का मजा लेने के लिए चश्मा लगाने की जरूरत नहीं होगी। साथ ही थ्री डी वीडियो देखते हुए दूसरे विंडो में टू डी यानी इंटरनेट का यूज किया जा सकता है। साथ ही इस लैपटॉप में रियल टाईम कनवर्टर लाग हुआ है जो टू डी डीवीडी को भी थ्री डी में बदल देता है। यानी आप बाजार से कोई भी डीवीडी खरीद कर उसे थ्री डी में देख पाएंगे। कई खुबियों से लैस इस लैपटॉप को खासतौर पर डॉक्टर, साइंटिस्ट, आर्किटेक्ट जैसे प्रोफेशनल्स के लिए तैयार किया गया है। इस लैपटॉप की कीमत है 85 हजार रुपए। एचडीएमआई केबल के जरिए इस लैपटॉप को किसी भई थ्री डी टीवी से कनेक्ट किया जा सकता है। तोशीब ने भारत में टीवी और होम अप्लाइंसेज बिजनेस को पर्सनल कम्प्यूटर डिवीजन के साथ मर्ज करने का फैसला किया है। साथ ही अपना ब्रांड इमेज बनाने के लिए मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर को अपना ब्रांड एंबेस्डर बनाया है। कंपनी ने 10 हजार रुपए की 19 इंच की एलईडी टीवी भी लांच किया है।

Wednesday, July 20, 2011

एक आदमी ने खरीदी 90 मर्सिडीज़ कारें

लग्ज़री कार बनाने वाली जर्मनी की कंपनी मर्सीडीज़ बेंज ने भारत में एक साथ 90 मर्सिडीज कारें बेची हैं। और ये कार खरीदी है रेंट पर कार देने वाली एक कंपनी के मालिक राजीव विज ने। ये सभी कारें सी क्लास की हैं। अपने इस खास ग्राहक को 90 कारों की डिलीवरी देने के लिए मर्सिडीज़ बेंज ने खासतौर पर एक कार्यक्रम का आयोजन किया। राजवी विज को इतने बड़े कारों का जखीरा खरीदने के लिए करीब 25 करोड़ रुपए खर्च करने पड़े। भारत में इससे पहले एक साथ इतनी लग्जरी कारें किसी ने नहीं खरीदी है। राजीव विज कार्ज ओन रेंट नां की एक कंपनी चलाते हैं। और इससे पहले भी साल 2008 में मर्सिडीज़ कंपनी से 70 कारों का एक फ्लीट खरीद चुके हैं। यानी इस वक्त राजीव की कंपनी के पास 160 मर्सिडीज कारें हो गई हैं। जो कि भारत में सबसे ज्यादा है। और अगर दूसरे ब्रांड की कारों की बात करें तो सभी ब्रांड मिलाकर राजीव की कंपनी के पास 6500 के करीब कारें हैं। राजीव का मानना है कि ये गाड़ियां हर साल 50 करोड़ रुपए का बिजनेस करेंगी। राजीव की कंपनी के ग्राहकों में हवाई जहाज में सफर करने वाले और फाइव स्टार में रहने वाले पैसे वाले लोग शामिल हैं। इसके साथ ही कॉरपोरेट हाउसों से उनका टाई-अप है। ऐसे में वो आसानी से देशभर में अपनी कारें भारे पर चला रहे हैं।

Tuesday, July 19, 2011

इंश्योरेंस कंपनियों पर सेबी सख्त इरडा नरम

हेल्थ इंश्योरेंसकंपनियां अब लोगों से प्रीमियम लेने के साथ ही शेयर बाजार से फंड का भी बंदोबस्त कर सकती हैं। इसके लिए इन कंपनियों को लगातार तीन साल तक प्रॉफिट में रहने के सेबी के सख्त नियम का पालन नहीं करना होगा। इस महीने के अंत तक इन कंपनियों के आईपीओ पर फाइनल गाइडलाइन तय हो जाएगा। जिसके बाद कंपनियां शेयर बाजार में लिस्ट हो सकती हैं। औद्योगिक संगठन फिक्की के एक समारोह के दौरान इंश्योरेंस रेग्युलेटर आईआरडीए के चेयरमैन जे हरि नारायण ने कहा है कि इस महीने के आखरि तक हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियों के आईपीओ पर फाइनल गाइडलाइन बनकर तैयार हो जाएगा। नए गाइडलाइंस में हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियां को कुछ छूट दी गई है। इन कंपनियों को लगातार तीन साल तक प्रॉफिट नहीं दिखाने पर भी शेयर बाजार में जगह दी जाएगी। हालांकि शेयर बाजार रेग्युलेटर सेबी कंपनियों के लिए कड़े नियम बना रखे हैं ताकि इन कंपनियों में पैसे लगाने वाले आम लोगों को नुकसान ना हो। शेयर बाजार में लिस्ट होने वाली कंपनियों यानी आईपीओ लाने वाली कंपनियों को लगातार तीन साल तक प्रॉफिट में रहना होगा। तभी वो कंपनियां शेयर बाजार से फंड जुटा पाएंगी। लेकिन इंश्योरेंस रेग्युलेटर ने इसमें ढ़ील देने का मन बना चुकी। ऐसे में हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियों को फायदा ही फायदा है। एक तरफ तो वो मनचाहे प्रीमियम से कमाई कर ही रही हैं। आने वाले दिनों में शेयर बाजार से भी कमाई करेंगी। लेकिन इन कंपनियों के फाइनेंशियल हेल्थ पर खरोच भी लगी तो दर्द पॉलिसी लेने वालों से लेकर इन कंपनियों में निवेश करने वाले लोगों को होगा।

Monday, July 11, 2011

विदेशी कार कंपनियों की प्रफुल को ज्यादा चिंता!

केंद्रीय भारी उद्योग मंत्री प्रफुल पटेल ने विदेशी कंपनियों को राहत दिलाने की ठान ली है। इसके लिए आयात करों में राहत के लिए वित्त मंत्रालय से वकालत करने का आश्वासन दिया है। इस बजट में सरकार ने कंपलीटली नॉक्ड डाउन यूनिट यानी सीकेडी यूनिट पर आयात कर सरकार ने 10 फीसदी से बढ़ाकर 30 फीसदी कर दिया था। बीएमडब्ल्यू, मर्सिडीज, ऑडी और फेरारी जैसी गाड़िया पहले ही काफी महंगी होती हैं। ऐसे में सरकार के कंपलीटली नॉक्ड डाउन यूनिट पर आयात कर 10 फीसदी से बढ़ाकर 60 फीसदी करने पर ये गाड़ियां और महंगी हो गयीं। जिसके बाद विदेशी कार बनाने वाली कंपनियों ने काफी हाय तौबा मचाया। इसे सुनकर सरकार ने सीकेडी पर ड्यूटी घटाकर 30 फीसदी कर दिया। लेकिन कंपनियां इसे और कम करबाना चाहती हैं। ऐसी महंगी कारों को खरीदने वाले करोड़पतियों का ख्याल हमारे भारी उद्योग मंत्री को भी है। इसीलिए वो इसपर टैक्स की कमी करने की वकालत वित्त मंत्रालय से करने की तैयारी में हैं। और इसका आश्वासन दे रहे हैं। जबकि टैक्स इसलिए बढ़ाया गया है कि ये कंपनियां टैक्स की डर से भारत में अपना मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाएंगी। इससे ना केवल देश में निवेश बढ़ेगा बल्कि रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। लेकिन इसके लिए लगतार है केंद्रीय भारी उद्योग मंत्री प्रफुल्ल पटेल सहमत नहीं हैं। हालांकि भारतीय ऑटो इंडस्ट्री की सिरमौर संस्था सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल एसोसिएशन यानी सियाम के साथ बैठक में केंद्रीय भारी उद्योग मंत्री ऑटो इंडस्ट्री को नए मुकाम पर पहुंचाने की जरूरत पर जरुर बल दे रहे हैं। और इसके लिए हर छे महीने में ऑटो इंडस्ट्री के साथ बैठक की बात की है। लेकिन मंत्री जी की बातों में सस्ती कारों और देशी ऑटो कंपनियों के विकास से ज्यादा विदेशी कंपनियों के हितों की चिंता झलक रही थी। ऐसे में लगता है इन्होंने एयर इंडिया का जो हाल किया है वो भविष्य में कहीं हमारे ऑटो इंडस्ट्री की ना हो जाए।

Saturday, July 9, 2011

एफएम को सरकारी माउथपीस बनाने की तैयारी

जैसे-जैसे एफएम रेडियो का विस्तार होगा। एफएम रेडियो मीडिया का एक ताकतबर माध्यम बनकर उभरेगा। सरकार इसे बखूबी जानती है। तभी इसे अपने पक्ष में यूज करने की जुगत में लगी है। जी हां सरकार ने तीसरे चरण में एफएम रेडियो के 227 चैनलों की नीलामी की मंजूरी दे दी है। इससे सरकार को 1733 करोड़ रुपए की कमाई होगी। और एफएम रेडियो का जाल 86 शहरों से बढ़कर 294 शहरों में फैल जाएगा। सरकार की मंशा 839 एफएम रेडियो की माध्यम से अपनी पीठ थपथपाना और अपनी परियोजनाओं का प्रचार करना है। यही वजह से की सरकार ने एफएम चैनलों को न्यूज प्रसारण की इजाज़त नहीं दी है। लेकिन सरकारी बुलेटिन के प्रसारण की छूट इन एफएफ रेडियो को दे दिया है। यानी अगर कोई एफएम रेडियो चाहे तो ऑल इंडिया रेडियो के बुलेटिन का प्रसारण कर सकती है। लेकिन वो भी अनकट यानी उस बुलेटिन में किसी तरह का बदलाव की इजाज़त नहीं होगी। हालांकि स्थानीय लोगों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए स्पोर्ट्स के आयोजनों, ट्रैफिक, मौसम, प्रतियोगी परीक्षाओं, प्राकृतिक आपदाओं, स्वास्थ्य और जल-बिजली की आपूर्ति से संबंधित खबरों को दिखाने की इजाज़त होगी। लेकिन राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय खबरें, मुद्रा, बैंकिंग, व्यापार, प्रतिरक्षा, विदेश नीति, राजनीति और आंतरिक सुरक्षा से संबंधित खबरें ऑल इंडिया रेडियो से ही उठानी होंगी। इतने सालों के बाद भी एफएम रेडियो पर न्यूज तो चलेगा लेकिन सरकारी। सरकार को इस फैसले पर एक बार फिर से गौर फरमाने की ज़रूरत है। क्योंकि अब जमाना बदल चुका है। खबरों के लिए बहुत सारे ऑप्शन बाजार में आ चुके हैं। क्षेत्रीय टीवी चैनलों की पहुंच भारत के चप्पे चप्पे तक पहुंच चुकी है। इंटरनेट के इस जमाने में अमेरिका भी न्यूज पर लगाम लगाने की स्थिति में नहीं है। विकीलिक्स ने अमेरिका की नींद उड़ा रखी है। ऐसे में सरकार अगर सचमुच अपनी बात लोगों तक पहुंचाना चाहती है। तो उसे खबरों की विश्वसनीयता बढ़ाने पर जोर देना होगा। और तब सरकार को कानून बनाकर उसे कहीं चलवाने की ज़रुरत नहीं होगी। चैनल और रेडियो वाले उसे खुद ब खुद चलाएंगे। ऐसे में सरकार को जागने की ज़रुरत है। अगर कानून बनाकर सरकार जबरदस्ती अपनी खबरों को चलाना चाहेगी तो उससे कुछ ज्यादा बदलाव संभव नहीं है। क्योंकि लोग अब समझदार हो गए हैं। पहले भी लोग ऑल इंडिया रेडियो से ज्यादा बीबीसी पर भरोसा करते थे। अब तो खैर खबरों के साधन कई गुना बढ़ चुके हैं। ऐसे में एफएम रेडियो पर स्वतंत्र न्यूज नहीं चलाने का सरकार का ये फैसला स्वागत योग्य नहीं है।

Friday, July 8, 2011

एसबीआई ने महंगा किया कर्ज

देश के सबसे बड़े बैंक एसबीआई यानी स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से लोन लेने वालों ग्राहकों को अब 0.25 फीसदी महंगा कर्ज मिलेगा। हालांकि तीन महीने और उससे ऊपर के फिक्स्ड डिपॉजिट पर ग्राहकों को राहत देते हुए बैंक ने 100 बेसिस प्वाइंट तक ब्याज बढ़ा दी है। साथ ही समय से पहले पैसे निकालने पर लगने वाली पेनाल्टी को भी कम किया है। देश के सबसे बड़े बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने कर्ज महंगा कर दिया है। एसबीआई ने बेस रेट और बीपीएलआर में 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी कर दी है। ऐसे में होम लोन, कार लोन, एजुकेशन लोन सहित हर तरह का कर्ज महंगा हो गया है। बैंक के इस कदम से जहां नए ग्राहकों के लिए कर्ज महंगा हो जाएगा। वहीं फ्लोटिंग रेट पर कर्ज लेने वाले ग्राहकों की ईएमआई बढ़ जाएगी। इस वित्त वर्ष में देश के सबसे बडे़ बैंक एसबीआई ने कर्ज की ब्याज दरों में तीसरी बार इजाफा किया है। एसबीआई की नई बेस रेट 11 जुलाई से प्रभाव में आएगी। इसके साथ ही एसबीआई ने जमा राशि पर ब्याज दरों में भी 100 बेसिस प्वाइंट तक की बढ़ोतरी की है। इसके तहत 90 दिनों तक की जमा राशि के लिए बैंक 6.75 की बजाए 7 फीसदी ब्याज देगा। वहीं 91 से 189 दिनों के लिए बचत की जमा दर 7.25 फीसदी होगी। एक साल से ज्यादा अवधि की जमा पर ग्राहकों को 9.25 फीसदी की दर से ब्याज मिलेगा। एसबीआई ने 90 दिनों के डिपॉजिट पर समय से पहले रकम निकालने पर लगने वाली पेनाल्टी खत्म कर दी है। और 90 दिनों से ज्यादा की जमा पर पेनाल्टी 50 बेसिस प्वाइंट यानी आधा फीसदी घटाकर 0.5 फीसदी कर दी है। यानी पैसे जमा करने वालों को थोड़ी राहत मिली है लेकिन नए कर्ज लेने वालों और फ्लोटिंग रेट पर पहले से कर्ज ले चुके ग्राहकों पर इसकी मार पड़ेगी। और उनके कार या घर का ईएमआई बढ़ जाएगा। ये बढ़ोतरी रिजर्व बैंक की सख्त मौद्रिक नीतियों का नतीजा है।

Thursday, July 7, 2011

चावल-गेहूं एक्सपोर्ट करने की तैयारी

कृषि मंत्री शरद पवार पहले चावल और गेहूं के निर्यात पर हामी भर रहे थे। लेकिन अब उन्होंने अपना रुख बदल दिया है। अब पवार इन खाद्यानों ने निर्यात का विरोध कर रहे हैं। जबकि खाद्य मंत्री के वी थॉमस ने निर्यात की वकालत की है। कृषि और खाद्य मंत्रालय में टकराव के चलते सरकार गेहूं और चावल के निर्यात पर फैसला नहीं कर पा रही है। खाद्य मंत्रालय का कहना है कि निर्यात न होने से जहां एक ओर खुले में रखा अनाज सड़ेगा वहीं दूसरी तरफ इसका खामियाजा किसानों को भी उठाना पड़ेगा। गैर बासमती चावल के निर्यात पर अप्रैल 2008 से और गेहूं के निर्यात पर फरवरी 2007 से रोक लगी हुई है। कृषि मंत्री शरद पवार ने कहा कि हम निर्यात शुरू करने की स्थिति में नहीं हैं। क्योंकि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक अभी पारित नहीं हुआ है। यह विधेयक आगामी मानसून सत्र में संसद में पेश किया जा सकता है। तब ये पता चल पाएगा कि इसके लिए कितने अन्न की जरुरत होगी। वहीं दूसरी ओर खाद्य मंत्रालय ने 40 लाख टन गेहूं और गैरबासमती चावल के निर्यात का प्रस्ताव रखा है। इस मामले पर 11जुलाई को खाद्य मामलों से जुड़े मंत्रियों की बैठक में फैसला हो सकता है। अन्न के निर्यात को पवार और थामस के राजनीतिक टकराव के रूप में देखा जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूक्रेन, रूस और ऑस्ट्रेलिया के गेहूं की भारी आपूर्ति से कीमतें नीचे आ गई हैं। ऐसे में खाद्यान्न निर्यात का फैसला व्यावहारिक नहीं होगा। इसीलिए पवार ने खाद्य सुरक्षा विधेयक की आड़ लेकर निर्यात के फैसले से खुद को अलग कर लिया है। जबकि पवार पिछले एक महीने से सरकार पर गेहूं व चावल निर्यात के लिए दबाव बनाए हुए थे। वहीं के वी थॉमस स्टोरेज समस्या को लेकर परेशान हैं। क्योंकि पिछले दो से तीन सालों से एक्सपोर्ट पर प्रतिबंध लगने के बाद सरकारी गोदामों में जगह नहीं बची है। फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया यानी एफसीआई के पास 6 करोड़ 20 लाख टन अनाज रखने की जगह है इसके बावजूद एफएओ ने 6 करोड़ 50 लाख टन अन्न जमा कर रखा है। और जब खरीफ फसल आएगी को सरकार उसे कहां रखेगी। जाहिर है आनन फानन में ये फैसला लिया जा सकता है कि अन्न का एक्सपोर्ट करो नहीं तो अनाज़ सड़ जाएंगे। लेकिन सरकार चाहे तो दूसरा बंदोबस्त कर सकती है। एक ओर जहां सरकार अरबों रुपए का फूड सिक्योरिटी बिल लाने जा रही है। वहीं दूसरी ओर फूड को सिक्योर करने के लिए सरकार के पास जगह नहीं है।

RIL लूटती रही देवड़ा मुरली बजाते रहे

कॉरपोरेट मामलों के मंत्री मुरली देवड़ा का जाना लगभग तय है। भले ही वो अपने इस्तीफे की पेशकश को अपनी निजी कारणों से जोड़ रहे हैं। लेकिन इसके पीछे की राजनीति कुछ और है। दरअसर कैग की रिपोर्ट में मुरली देवड़ा पर कई आरोप लगाए गए हैं। ऐसे में सरकार ने उन्हें कैबिनटे में फेरबदल से पहले ही मंत्रीमंडल से किनारा कर लेने की सिग्नल दे दी है। क्योंकि ए राजा के नाम पर सरकार की पहले ही काफी फजीहत हो चुकी है। और अब मुरली देवड़ा के नाम पर सरकार और फजीहत नहीं झेलना चाह रही है। कॉरपोरेट मामलों के केंद्रीय मंत्री मुरली देवड़ा ने यूं ही इस्तीफे की पेशकश नहीं की। बतौर पेट्रोलियम मंत्री रिलायंस पेट्रोलियम को लाभ पहुंचाने की उनकी भूमिका पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी कैग की ओर से सवाल के बाद उनका जाना ऐसे भी लगभग तय था। और इसके संकेत उन्हें मिल चुके थे। ऐसे में सम्मानजनक स्थिति को बनाए रखने के लिए उन्होंने मंत्री पद से खुद इस्तीफा दे देना ही मुनासिब समझा। कैग की रिपोर्ट सरकार के लिए गले की फांस बन सकती है। क्योंकि इस रिपोर्ट में मुरली देवड़ा पर उंगली उठाई गई है। इसमें कहा गया है कि साल 2006 से साल 2011 के बीच पेट्रोलियम मंत्री रहते हुए मुरली देवड़ा ने मुकेश अंबानी की कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज को फायदा पहुंचाया है। कैग के रिपोर्ट के मुताबिक रिलायंस इंडस्ट्रीज को एक्सप्लोरेशन के लिए तय सीमा से ज्यादा समय दिया गया। साथ ही रिलायंस इंडस्ट्रीज से अनएक्सप्लोर्ड कांट्रैक्ट एरिया वापस नहीं ली गई। यही नहीं आरआईएल ने एक्सप्लोरेशन पर खर्च 117 फीसदी ज्यादा दिखाया। इससे सरकार को सैकड़ों करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है। ऐसे गंभीर आरोपों के बाद सरकार संसद के आगामी सत्र में मुरली देवड़ा को अपने लिए नई मुसीबत के रूप में देख रही है। सरकार को ये डर सता रहा था कि विपक्ष इसे जरूर मुद्दा बनाएगा। जिससे संसद में सरकार की फजीहत हो सकती है। लिहाजा सरकार ने मुरली देवड़ा को खुद ही हट जाने के संकेत दे दिए। हालांकि मुरली देवड़ा ढ़िढोरा पीट रहे हैं कि वो व्यक्तिगत मामलों की वजह से मंत्री पद छोड़ना चाहते हैं।

Monday, July 4, 2011

जुगाड़ का होगा पेटेंट

भारतीय जुगाड़ को मिलने वाला है लीगल सपोर्ट। जी हां जुगाड़ से बनी चीजों पर आने वाले दिनों में कॉपीकैट या पाइरेसी का आरोप नहीं लगेगा। क्योंकि भारत सरकार इसे इंटीलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स के अंतर्गत लाने वाली है। इस दिशा में डिपार्टमेंट ऑफ इंडस्ट्रियल पॉलिसी एंड प्रोमोशन जल्द ही एक बिल पारित करने वाली है। जिसके तहत जुगाड़ से बनी चीजों का होगा पेटी पेटेंट्स या इनोवेशन पेटेंट्स। इस पेटेंट्स से छोटे घरेलू उद्योगों को काफी राहत मिलेगी। यानी की उनपर पेटेंट नियम का पूरी तरह से पालन करने का दबाव नहीं रहेगा। इस तरह के पेटेंट को यूटिलिटी मॉडेल्स भी कहा जाता है। ये मॉडल जापान, जर्मनी, चीन सहित करीब 50 देशों में पहले से मौजूद है। हालांकि इंटेल, माइलेन जैसी दुनियाभर की दिग्गज कंपनियां इसका विरोध कर रही हैं। उनको डर है कि इस तरह के पेटेंट का दुरुपयोग हो सकता है। लेकिन डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन यानी डीआरडीओ ने इसका सपोर्ट किया है। डीआरडीओ का मानना है कि इस तरह के पेटेंट से वेपन सिस्टम के विकास में भी मदद मिलेगी। वहीं साइंस एंड टेक्नोलॉजी डिपार्टमेंट ने सरकार को राय दी है कि जुगाड़ के जरिए तैयार किए गए प्रोडक्ट्स के पेटेंट की सीमा 8 से 10 साल तक ही रखना चाहिए। इस पेटेंट के तहत क्ले रेफ्रिजरेटर, कूकर की सिटी सुनकर बंद होने वाले गैस स्टोव के स्वीच जैसे प्रोडक्ट आएंगे। नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन ने साल 2000 से इस तरह के करीब 1 लाख आइडिया का डेटाबेस तैयार किया है। जिसमें से 200 का पेंटेट भारत में और 33 का पेटेंट अमेरिका में हो चुका है। जुगाड़ बिल या पेटी पेटेंट के लागू हो जाने के बाद देशी तरीकों से तैयार प्रोडक्ट की बिक्री में किसी तरह की दिक्कत नहीं आएगी। और हो सकता है आने वाले दिनों में आपके हाथ में देशी तरीके से बना कोई आईपैड-आईफोन यानी इंडियापैड या इंडियाफोन आ जाए तो आपको हैरानी नहीं होनी चाहिए। हालांकि सरकार ने जुगाड़ के इस्तेमाल को फॉर्मा सेक्टर से दूर रखा है। क्योंकि दबाई बनाने में जुगाड़ अगर काम नहीं किया तो लोगों की जान जा सकती है।

Friday, July 1, 2011

खाना बन जाएगा लग्जरी आइटम

आने वाले वर्षों में दुनिया किसी चीज की अगर सबसे ज्यादा कीमत होगी। तो वो होगा खाना। खाने के लिए लोग कोई भी कीमत देने को तैयार होंगे। लेकिन उन्हें खाना नसीब नहीं होगा। लोगों को दो समय के भोजन के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ेगी। अगर अभी भी दुनयाभर की सरकार नहीं जागी तो इस भयावह स्थिति से हमें कोई नहीं बचा सकता। दरअसल जिस रफ्तार से खाने वाले लोगों की संख्यां बढ़ रही है। उस रफ्तार से हमारी उपज नहीं बढ़ रही। यहां तक की भारत जैसे कई देशों में उपजाऊ ज़मीन पर भी बिल्डिंगे और कारखाने लगाए जा रहे हैं। जिसका खामियाजा इन देशों को आने वाले दिनों ज़रूर देखने को मिलेगा। साथ ही बाढ़ और सूखे की वजह से फसल बर्बाद हो रहे हैं। यही नहीं अमेरिका सहित कई देश फसलों से इथिनॉल पैदा कर रहे हैं। यूनाईटेड नेशन के फूड और एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन यानी एफएओ और वर्ल्ड बैंक बार-बार इस मुद्दे को दुनिया के सामने रख रहा है। अभी हाल ही में 20 देशों के कृषि मंत्रियों के साथ इनकी बैठक हुई है। जिसमें वर्ल्ड बैंक और एफएओ ने कृषि उत्पादन बढ़ाने पर ज़ोर दिया है। और कृषि क्षेत्र में नई-नई तकनीकों का इस्तेमाल करने की सलाह दी है। ताकि कंज्यूमर के बढ़ते रफ्तार के साथ ही फसलों के उत्पादन में भी तेजी लाई जा सके। खाने-पीने के सामानों की कीमतों में जबरदस्त तेजी के पीछे सबसे बड़ी वजह यही है। डिमांड में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है जबकि सप्लाई में कमी बनी हुई है। एफएओ की माने तो पिछले 11 महीनों में खाने पीने की कीमतों में करीब 9 गुना तेजी आई है। और इस महंगाई ने करीब 4 करोड़ 40 लाख लोगों को गरीबी में धकेल दिया है। आज भले ही ताकतबर और पैसे वाली इकॉनोमी पैसे के दम पर दुनिया से सबसे बेहतर उत्पाद का सेवन कर रहे हों। लेकिन एक दिन ऐसा आएगा जब करोड़ो रुपए खर्च करने के बावजूद उन्हें अन्न नसीब नहीं होंगे। तब उन्हें उन उपजाऊ देशों पर कोई ना कोई बहाना बनाकर हमला करना पड़ेगा जैसे आज वो तेल के लिए कर रहे हैं। इसलिए आज की तारीख में अगर कोई किसान अपनी ज़मीन कुछ पैसों की लोभ पर अगर बेच रहा है तो उसे ऐसा नहीं करना चाहिए। बल्कि उसे कुछ पैसे जोड़कर और ज़मीन खरीदनी चाहिए। क्योंकि आने वाले दिनों में फसलों की कीमत बहुत ज्यादा बढ़ने वाली है। और तब अमीर आदमी की गिनती इस बात पर होगी की वो कितना और क्या खाता है ना कि उसके पास कितनी गाड़ियां और कितने फ्लैट हैं।